पटना: बिहार में शहरों के नाम बदलने की मांग के बीच अब सरकार की नीयत पर ही सवाल उठने लगे हैं। पटना को पाटलिपुत्र, बख्तियारपुर को व्यासपुर, औरंगाबाद को आदित्य नगर, जहानाबाद को मांडवी नगर और सुल्तानगंज को अजगैबीनाथ करने की चर्चा तेज है, लेकिन जनता पूछ रही है—क्या नाम बदलने से बेरोजगारी खत्म होगी?
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सत्ता में आने के बाद इस मुद्दे को जिस तरह हवा मिली है, उसने राजनीतिक मंशा पर शक और गहरा कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार असली मुद्दों से भाग रही है और जनता का ध्यान भटकाने के लिए “नाम बदलो अभियान” चला रही है।
राज्य में शिक्षा व्यवस्था बदहाल है, अस्पतालों में संसाधनों की कमी है, युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा—लेकिन सरकार शहरों के नाम बदलने में व्यस्त है। सवाल उठता है कि क्या यही है “विकास मॉडल”?
इतिहास और संस्कृति के नाम पर राजनीति नई नहीं है, लेकिन इसे विकास का विकल्प बताना क्या जनता के साथ धोखा नहीं है? समर्थक इसे “गौरव की वापसी” बता रहे हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है।
सबसे बड़ा सवाल खर्च को लेकर भी है। इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने में करीब 300 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। अगर बिहार के पांच शहरों के नाम बदले जाते हैं, तो हजारों करोड़ का बोझ जनता पर पड़ेगा। क्या यह पैसा रोजगार, सड़क, अस्पताल और शिक्षा पर खर्च नहीं होना चाहिए?
कानूनी प्रक्रिया भी लंबी और जटिल है, लेकिन उससे पहले ही इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बना दिया गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि नाम बदलने से न तो निवेश बढ़ेगा और न ही राज्य की आर्थिक स्थिति में कोई बड़ा बदलाव आएगा।
फिलहाल बिहार में यह बहस तेज हो चुकी है—एक तरफ सरकार “पहचान” की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ जनता “काम” मांग रही है। अब देखना यह है कि सरकार नाम बदलने की राजनीति से आगे बढ़कर असली विकास पर ध्यान देती है या नहीं।
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