पटना: पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर इस बार मुकाबला सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि “इमेज बनाम सिस्टम” की लड़ाई बनने जा रहा है। जन सुराज पार्टी ने बड़ा दांव खेलते हुए साफ कर दिया है कि इस उपचुनाव में खुद प्रशांत किशोर मैदान में उतरेंगे। जैसे ही यह ऐलान हुआ, बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई।
जन सुराज के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती ने आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि पार्टी ने बांकीपुर से प्रशांत किशोर को उम्मीदवार बनाया है। इसके बाद पीके ने भी खुलकर कहा कि “चार सालों से जन सुराज ही मेरी जिंदगी है, अब जो जिम्मेदारी मिली है उसे निभाऊंगा।” साफ है कि यह चुनाव उनके लिए सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि राजनीतिक पहचान की लड़ाई है।
दरअसल, नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद से ही यह सीट खाली हुई और तभी से चर्चा थी कि पीके यहां से दांव खेल सकते हैं। खुद प्रशांत किशोर पहले ही संकेत दे चुके थे कि अगर उनके उतरने से भाजपा जैसी मजबूत पार्टी को चुनौती मिलती है, तो वे पीछे नहीं हटेंगे।
घोषणा के तुरंत बाद पीके पटना जंक्शन स्थित महावीर मंदिर पहुंचे और पूजा-अर्चना की। यह कदम सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि चुनावी संदेश भी माना जा रहा है—कि वे इस लड़ाई को पूरी गंभीरता से लेने वाले हैं।
पीके ने इस दौरान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि “वह पिछली गली से मुख्यमंत्री बने हैं, जनता ने नहीं चुना।” इस बयान के बाद सियासी बयानबाजी और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल भाजपा का उम्मीदवार है। पार्टी ने अभी नाम घोषित नहीं किया है, लेकिन अंदरखाने तीन नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।
पहला नाम नील रतन घोष का है, जिन्हें नितिन नवीन का करीबी माना जाता है और स्थानीय कार्यकर्ताओं की भी पसंद बताए जा रहे हैं। दूसरा चेहरा अजय आलोक का है, जो टीवी डिबेट्स में भाजपा का मजबूत पक्ष रखते हैं और शहरी वोटरों में पहचान रखते हैं। तीसरा नाम रणवीर नंदन का है, जो शिक्षित और सॉफ्ट इमेज वाले नेता माने जाते हैं।
बांकीपुर सीट को यूं ही VIP सीट नहीं कहा जाता। यह पूरी तरह शहरी, पढ़ा-लिखा और सवर्ण बहुल इलाका है। करीब 3.8 लाख वोटरों वाली इस सीट पर कायस्थ समाज सबसे निर्णायक भूमिका में रहता है। इसके अलावा ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत वोटर भी यहां चुनाव का रुख तय करते हैं। मुस्लिम, यादव और दलित वोट भी संतुलन बनाने में अहम होते हैं।
इतिहास देखें तो यह सीट भाजपा का गढ़ रही है। 1995 से लेकर अब तक भाजपा यहां लगातार जीतती आई है। 2020 और 2025 के चुनाव में भी भाजपा ने यहां बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी। ऐसे में पीके के सामने चुनौती आसान नहीं है।
लेकिन इस बार समीकरण थोड़े अलग हैं। प्रशांत किशोर खुद मैदान में उतर रहे हैं, जो अब तक पर्दे के पीछे रणनीति बनाने के लिए जाने जाते थे। उन पर अक्सर आरोप लगता था कि वे चुनाव लड़ने से बचते हैं। अब खुद चुनाव लड़कर वे इस छवि को तोड़ना चाहते हैं।
दूसरा बड़ा फैक्टर महागठबंधन हो सकता है। अगर RJD और कांग्रेस यहां कमजोर उम्मीदवार उतारते हैं या अंदरखाने पीके को समर्थन देते हैं, तो मुकाबला सीधा हो सकता है। ऐसे में लगभग 30% वोट बैंक का ट्रांसफर गेम बदल सकता है।
तीसरा फैक्टर युवा वोटर हैं। बांकीपुर में बड़ी संख्या में पढ़े-लिखे युवा हैं, जो नौकरी, शिक्षा और भविष्य जैसे मुद्दों पर वोट करते हैं। पीके का “बिहार में रोजगार” वाला नैरेटिव अगर यहां पकड़ बना गया, तो भाजपा को कड़ी टक्कर मिल सकती है।
फिलहाल स्थिति यह है कि भाजपा के लिए यह सीट प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुकी है, जबकि प्रशांत किशोर के लिए यह “राजनीतिक अस्तित्व” की परीक्षा है। अगर वे यहां मजबूत लड़ाई देते हैं या जीत जाते हैं, तो जन सुराज को बिहार में एक नए विकल्प के रूप में स्थापित कर सकते हैं।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि भाजपा किसे मैदान में उतारती है और क्या यह मुकाबला त्रिकोणीय रहेगा या सीधी टक्कर में बदल जाएगा। इतना तय है कि बांकीपुर उपचुनाव इस बार सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति की दिशा तय करने वाला बड़ा संकेत बन सकता है।
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