नालंदा के हरनौत प्रखंड का पोआरी पंचायत इन दिनों प्यासा है… और प्यास सिर्फ पानी की नहीं, जवाबदेही की भी है।
वार्ड नंबर 13 में पिछले 20 दिनों से करीब 250 घरों में पानी की एक बूंद तक नहीं पहुंची। सरकारी फाइलों में करोड़ों की योजना ‘सफल’ होगी, लेकिन जमीन पर हकीकत यह है कि नल सूखे हैं और लोग पानी के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
जिस नल-जल योजना को हर घर तक पानी पहुंचाने का सपना बताया गया था, वही अब ‘नल-छल’ बन गई है। गांव में बनी जलमीनार और बिछी पाइपलाइन अब सिर्फ सरकारी दिखावे की निशानी बनकर खड़ी हैं। मोटर जली, तार जले, सिस्टम फेल… और जिम्मेदार? वो कहीं नजर नहीं आ रहे।

गांव के गरीब परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। कुछ घरों में चापाकल है, लेकिन ज्यादातर लोग दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं। सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं और बेटियों को झेलनी पड़ रही है—जहां पानी के साथ-साथ उन्हें अपनी गरिमा से भी समझौता करना पड़ रहा है।
यह पहली बार नहीं है। डेढ़ महीने पहले भी यही समस्या आई थी, लेकिन स्थायी समाधान की जगह ‘जुगाड़’ से काम चलाया गया। इतना ही नहीं, मोटर चालू करने के दौरान करंट लगने की घटना भी सामने आई—यानी अब पानी नहीं, जान का भी खतरा!
इस एक पंप से करीब ढाई सौ घरों के साथ एक आंगनबाड़ी केंद्र के 40 बच्चों का जीवन जुड़ा है। लेकिन सिस्टम की लापरवाही ने इन सबको संकट में डाल दिया है।
ग्रामीण अब खुलकर कह रहे हैं—अगर जल्द समाधान नहीं हुआ, तो वे सड़कों पर उतरेंगे और बिहार शरीफ कलेक्ट्रेट का घेराव करेंगे।
वहीं, बीडीओ डॉ. पंकज कुमार का कहना है कि शिकायत की जानकारी अब मिली है और पीएचईडी को जांच के निर्देश दिए गए हैं।
लेकिन बड़ा सवाल अब भी वहीं है— जब 20 दिन से गांव प्यासा था, तब सिस्टम सो रहा था या आंखें बंद कर रखा था?
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नालंदा से वीरेंद्र कुमार की रिपोर्ट…