हजारीबाग: हजारीबाग जिले के केरेडारी प्रखंड के फुसरी गांव में एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो दिल को झकझोर देती है और सिस्टम पर सवाल खड़े कर देती है। यह कहानी है दो मासूम अनाथ भाई-बहन सुनील और सुमन तिर्की की, जिनकी जिंदगी पहले ही दुखों से भर चुकी थी, और अब आसमान भी उनके खिलाफ हो गया है।
कुछ साल पहले एक सड़क हादसे में मां की मौत हो गई… फिर कुछ समय बाद आगजनी की एक घटना ने उनके पिता को भी उनसे छीन लिया। जो बचा, वह था सिर्फ एक कच्चा आशियाना और तीन अनाथ बच्चे, जो किसी तरह एक-दूसरे का सहारा बनकर जिंदगी से लड़ते रहे।
लेकिन हाल ही में हुई तेज बारिश ने वह आखिरी सहारा भी छीन लिया। उनका कच्चा घर भरभराकर गिर गया… और अब उनके सिर पर न छत है, न सुरक्षा, न ही कोई स्थायी सहारा।
सुनील तिर्की की आवाज़ में दर्द साफ झलकता है। वह बताते हैं कि कई बार पेट भरने के लिए गांव वालों पर निर्भर रहना पड़ता है। पढ़ाई पहले ही छूट चुकी है और अब हालात ऐसे हैं कि जीवन सिर्फ किसी तरह दिन काटने तक सीमित रह गया है।
वहीं सुमन तिर्की की आंखों में आंसू और जिम्मेदारी दोनों साथ दिखाई देते हैं। वह दूसरों के घरों में काम करके किसी तरह जीवन चलाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन अब जब खुद का घर ही नहीं रहा, तो मुश्किलें और बढ़ गई हैं। वह बस इतना चाहती हैं कि उन्हें एक पक्का घर, थोड़ा सहारा और एक स्थायी जीवन जीने का मौका मिल जाए।
गांव के लोग भी इस दर्दनाक स्थिति को देखकर भावुक हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन बच्चों की जान तो बच गई, लेकिन जिंदगी अब भी संघर्ष के बीच फंसी हुई है। लोग लगातार प्रशासन से मदद की गुहार लगा रहे हैं।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी इस मामले को गंभीर बताते हुए प्रशासन से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि अनाथ बच्चों को योजनाओं से वंचित रखना व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
आज यह भाई-बहन सिर्फ एक ही चीज़ मांग रहे हैं—“एक छत… जहां वे रात को बिना डर के सो सकें।”
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इन मासूम आंखों के आंसू देख पाएगा?
क्या इनकी पुकार सिस्टम तक पहुंचेगी? या फिर ये बच्चे यूं ही बेबस हालातों में जिंदगी से लड़ते रहेंगे…?
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