पटना: पटना से आई एक सकारात्मक और उम्मीद जगाने वाली खबर—जहां अब खेल प्रतिभा शहरों तक सीमित नहीं, बल्कि गांवों और जनजातीय इलाकों से निकलकर सामने आ रही है। बिहार राज्य खेल प्राधिकरण ने इस बार खिलाड़ियों को बुलाने के बजाय खुद उनके दरवाजे तक पहुंचकर एक नई मिसाल पेश की है।
पूर्णिया और कटिहार के जनजातीय क्षेत्रों में 2 से 4 जुलाई तक चले चार दिवसीय विशेष अभियान में 1000 से ज्यादा बच्चों ने हिस्सा लिया। यह सिर्फ एक चयन प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि उन बच्चों के लिए मौका था, जो अब तक संसाधनों की कमी के कारण पीछे रह जाते थे। बैट्री टेस्ट के बाद 112 लड़कियों सहित 350 से ज्यादा बच्चों का प्राथमिक चयन किया गया—जो इस पहल की सफलता को दर्शाता है।
इस अभियान की खास बात यह रही कि इसमें 12 से 14 वर्ष के आयुवर्ग के बच्चों को टारगेट किया गया, ताकि कम उम्र में ही प्रतिभा को पहचानकर सही दिशा दी जा सके। चयनित बच्चों को आगे एकलव्य खेल प्रशिक्षण केंद्रों से जोड़ा जाएगा, जहां उन्हें एथलेटिक्स, तीरंदाजी जैसे खेलों में प्रोफेशनल ट्रेनिंग दी जाएगी।
खेल प्राधिकरण का मानना है कि पहले कई प्रतिभाशाली बच्चे सिर्फ इसलिए पीछे रह जाते थे क्योंकि वे चयन प्रक्रिया तक पहुंच ही नहीं पाते थे। अब यह मॉडल उस दूरी को खत्म कर रहा है—जहां सिस्टम खुद प्रतिभा के पास पहुंच रहा है।
अब इस अभियान का अगला चरण जमुई, रोहतास, बेतिया और कैमूर के जनजातीय इलाकों में चलाया जाएगा। अगर किसी क्षेत्र में खिलाड़ियों की संख्या ज्यादा मिली, तो वहां नए प्रशिक्षण केंद्र खोलने की भी योजना है।
खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स जैसे राष्ट्रीय मंचों को देखते हुए यह पहल बिहार के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है। क्योंकि अब सिर्फ शहर नहीं, बल्कि गांवों के बच्चे भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकेंगे।
यह पहल सिर्फ खिलाड़ियों की खोज नहीं, बल्कि एक नई सोच का संकेत है—जहां हर प्रतिभा को मौका मिलेगा, चाहे वह कितनी ही दूर क्यों न हो।
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