मकर संक्रांति के साथ खरमास तो खत्म हो गया, लेकिन बिहार की राजनीति में मंत्री पद का इंतजार अब भी जारी है। नीतीश कुमार की 10वीं सरकार में फिलहाल 10 मंत्री पद खाली हैं, मगर कैबिनेट विस्तार की घड़ी अभी दूर नजर आ रही है। वजह है — मुख्यमंत्री की ‘समृद्धि यात्रा’ और फीडबैक आधारित राजनीति।
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आम तौर पर बजट सत्र से पहले मंत्रिमंडल विस्तार को परंपरा माना जाता है, लेकिन इस बार नीतीश कुमार जल्दबाजी के मूड में नहीं दिख रहे। 24 जनवरी तक चल रही उनकी यात्रा सिर्फ योजनाओं की समीक्षा नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन का एक बड़ा राजनीतिक सर्वे मानी जा रही है। सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री जमीन से मिलने वाले संकेतों के बाद ही तय करेंगे कि किसे कुर्सी मिलेगी और किसे इंतजार।
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इस बीच पटना के राजनीतिक गलियारों में बेचैनी चरम पर है। जदयू और भाजपा — दोनों खेमों में दावेदारों की लिस्ट लंबी है। जदयू में जहां उमेश कुशवाहा, नचिकेता मंडल और शालिनी मिश्रा जैसे नाम चर्चा में हैं, वहीं भाजपा में नीतीश मिश्रा, संजीव चौरसिया और रजनीश कुमार की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है।
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दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा मंत्रियों पर अतिरिक्त विभागों का बोझ बढ़ता जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद कैबिनेट विस्तार टाला जा रहा है। इससे यह संकेत भी मिल रहे हैं कि नीतीश कुमार सिर्फ जातीय या दलगत गणित नहीं, बल्कि परफॉर्मेंस और पब्लिक परसेप्शन को भी कसौटी बना रहे हैं।
2 फरवरी से शुरू होने वाले बजट सत्र में सरकार को बड़े फैसले लेने हैं। ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार अगर सत्र के बाद होता है, तो यह साफ होगा कि नीतीश कुमार चुनावी नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्थिरता को प्राथमिकता दे रहे हैं।
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फिलहाल बिहार की राजनीति में सवाल यही है—
यात्रा खत्म होने के बाद किसके नाम पर लगेगी मंत्री पद की मुहर और कौन सिर्फ उम्मीदों के सहारे रह जाएगा?