औरंगाबाद: बिहार के औरंगाबाद व्यवहार न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए करीब 58 साल पुराने जमीन विवाद का निष्पादन कर दिया है। वर्ष 1967 में दर्ज हुए स्वत्व वाद पर सोमवार को अदालत ने सुनवाई पूरी करते हुए वादी के पक्ष में फैसला सुनाया।
यह मामला स्वत्व वाद संख्या 96/67, 78/24 से जुड़ा था, जिसकी सुनवाई सबजज-अष्टम सह एसीजेएम-7 संदीप कुमार सिंह की अदालत में चल रही थी। अदालत के फैसले के बाद दशकों से चले आ रहे भूमि विवाद का अंत हो गया।
अधिवक्ता सतीश कुमार स्नेही ने बताया कि यह वाद जगनरायण यादव बनाम मुंगेश्वर यादव के नाम से दर्ज हुआ था। जब यह मुकदमा दाखिल किया गया था, उस समय औरंगाबाद जिला गया जिले का हिस्सा हुआ करता था। मामले में प्रतिवादी पहली बार 9 दिसंबर 1967 को न्यायालय में उपस्थित हुआ था।
1945 और 1946 के दस्तावेजों पर टिकी थी लड़ाई
इस जमीन विवाद में दोनों पक्ष रानी सैयदा खातून की जमींदारी सेटलमेंट को सही बता रहे थे। वादी पक्ष के पास 25 जनवरी 1946 का पैमाना था, जबकि प्रतिवादी पक्ष ने 21 अप्रैल 1945 के दस्तावेज को आधार बनाया था।
मामले में कई बार वाद बिंदुओं का निर्धारण किया गया। सुनवाई के दौरान वादी पक्ष की ओर से 12 गवाह, जबकि प्रतिवादी पक्ष की ओर से 6 गवाह पेश किए गए। लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद आखिरकार अदालत ने अपना फैसला सुनाया।
तीन कठ्ठा जमीन के लिए 58 साल की कानूनी लड़ाई
बताया गया कि विवादित जमीन खाता नंबर-31, प्लॉट नंबर-1488, रकबा-3 कठ्ठा से संबंधित थी। वादी पक्ष ने इस भूमि पर रैयत घोषित किए जाने की मांग की थी।
फैसले के बाद वादी संख्या-4 सुबेदार यादव ने कहा कि उन्हें न्यायालय पर पूरा भरोसा था। उन्होंने कहा कि देर जरूर हुई, लेकिन आखिरकार न्याय मिला।
कई पीढ़ियों के बाद मिला न्याय
इस मामले की खास बात यह रही कि मुकदमे से जुड़े अधिकांश पक्षकारों की समय के साथ मृत्यु हो चुकी है। करीब छह दशक तक चली कानूनी लड़ाई के बाद अब नेपवा गांव के परिवार को पुराने विवाद से मुक्ति मिली है।
अधिवक्ताओं ने इसे औरंगाबाद जिले के सबसे पुराने लंबित मामलों में से एक बताया और कहा कि यह फैसला न्याय व्यवस्था में लोगों के विश्वास को मजबूत करने वाला है।