धनबाद: झारखंड में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की हालत आज भी चिंताजनक बनी हुई है। हाई कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बावजूद राज्य में अब तक एक भी समुचित डे-केयर सेंटर स्थापित नहीं हो पाया है। इसका सीधा असर उन सैकड़ों बच्चों पर पड़ रहा है, जो हर महीने खून चढ़ाने पर निर्भर हैं।
धनबाद, गिरिडीह, जामताड़ा और हजारीबाग जिलों के करीब 310 मरीज इलाज के लिए धनबाद के एसएनएमएमसीएच अस्पताल पर निर्भर हैं। लेकिन यहां भी न तो पर्याप्त संसाधन हैं और न ही ऐसी विशेष व्यवस्था, जिससे इन मरीजों को राहत मिल सके। इलाज के नाम पर लंबा इंतजार, ब्लड की अनिश्चित उपलब्धता और दवाओं की कमी जैसी समस्याएं आम हैं।
मरीजों के परिजन बताते हैं कि हर 15 से 30 दिन में बच्चों को ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत होती है। ऐसे में समय पर ब्लड और इलाज नहीं मिलना उनके लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। कई बार उन्हें निजी स्तर पर ब्लड की व्यवस्था करनी पड़ती है, जिससे आर्थिक और मानसिक दबाव दोनों बढ़ते हैं।
इसी समस्या को लेकर समाजसेवी अंकित राजगढ़िया के नेतृत्व में अभिभावकों ने सिविल सर्जन डॉ. आलोक विश्वकर्मा से मुलाकात की और अपनी मांगों को रखा। उन्होंने डे-केयर सेंटर की स्थापना, विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती, नियमित दवा आपूर्ति, समय पर ब्लड उपलब्धता और थैलेसीमिया मरीजों के लिए अलग सेल बनाने की मांग की है।
अभिभावकों का कहना है कि यह केवल सुविधा की मांग नहीं, बल्कि उनके बच्चों के जीवन का सवाल है। अगर जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो वे रणधीर वर्मा चौक पर अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू करेंगे।
वहीं, सिविल सर्जन डॉ. आलोक विश्वकर्मा ने कहा कि वर्तमान में अधिकतर मरीज एसएनएमएमसीएच में ही इलाज करा रहे हैं, जिसके कारण अन्य अस्पतालों में मरीजों की संख्या कम है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि ब्लड की उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं और जगह मिलने पर डे-केयर सेंटर स्थापित करने पर विचार किया जाएगा।
इसके बावजूद बड़ा सवाल यही है कि जब हाई कोर्ट ने निर्देश दे दिया है, तो फिर थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को जरूरी सुविधा देने में इतनी देरी क्यों हो रही है। फिलहाल, इन बच्चों और उनके परिवारों के लिए हर दिन एक नई चुनौती बनकर सामने आ रहा है।
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