गिरिडीह: एक तरफ मधुबन—जहां देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं, जहां करोड़ों का चढ़ावा और संगमरमर की चमक दिखती है। वहीं उसी मधुबन पंचायत के भीतर बसे 10 टोलों की हकीकत ऐसी है कि आज भी यहां सड़क नहीं, बल्कि दर्द का रास्ता है। यहां एंबुलेंस नहीं आती—यहां आज भी खाट ही “जीवन रेखा” है।
27 मई और फिर 11 जुलाई—दो तारीखें, लेकिन कहानी एक ही। दोनों बार प्रसव पीड़ा से तड़पती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए खाट का सहारा लेना पड़ा। ताजा मामला करुआटांड का है, जहां संतोष मुर्मू की पत्नी को जब अचानक प्रसव पीड़ा हुई, तो परिजनों ने एंबुलेंस को फोन किया। लेकिन एंबुलेंस गांव तक पहुंच ही नहीं सकी—क्योंकि सड़क है ही नहीं।
इसके बाद जो हुआ, वो किसी फिल्म का सीन नहीं, बल्कि सिस्टम की सच्चाई है। ग्रामीणों ने महिला को खाट पर लिटाया और करीब 4 किलोमीटर तक पहाड़ी और पथरीले रास्तों से पैदल ढोकर पिपराडीह मुख्य सड़क तक पहुंचाया। वहां से किसी तरह वाहन मिला, तब जाकर अस्पताल पहुंचाया गया—जहां महिला ने बच्चे को जन्म दिया।
इससे पहले भी दलुवाडीह की एक महिला को इसी तरह खाट पर ढोकर 2-3 किलोमीटर तक ले जाना पड़ा था। सवाल ये है कि आखिर कब तक?
VIP के लिए नियम अलग, गरीबों के लिए अलग?
ग्रामीणों का गुस्सा साफ है। उनका कहना है कि जहां बड़े लोगों के लिए नियमों को मोड़कर सड़कें और निर्माण कर दिए जाते हैं, वहीं उनके लिए वन विभाग के नियम दीवार बन जाते हैं। “वहां सौ गुनाह माफ, यहां पत्ते-पत्ते पर रोक”—यही दर्द अब गुस्से में बदल रहा है।
क्यों नहीं बन रही सड़क?
असल वजह है यह इलाका वन्य प्राणी अभ्यारण क्षेत्र में आना। पारसनाथ को 42 साल पहले ही अभ्यारण घोषित किया गया था, और मधुबन से 500 मीटर आगे ही वन क्षेत्र शुरू हो जाता है। ऐसे में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के कारण सड़क निर्माण अटक जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इंसानों की जान से बड़ा कोई नियम हो सकता है?
प्रशासन को दी गई गुहार
10 टोलों के ग्रामीण—कुरुआतांड, दलुवाडीह, डाहिया, ईटाबेड़ा, गाड़ापरोम, सहेरबेड़ा, जिरबेड़ा, सतकटिया और बोरवाबेड़ा—पहले ही समाहरणालय पहुंचकर उपायुक्त रामनिवास यादव को ज्ञापन दे चुके हैं। सड़क, पुल-पुलिया, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग की गई है। DC ने गांव आकर स्थिति देखने का आश्वासन दिया है।
आखिर कब मिलेगी ‘कृपा’?
बीडीओ मनोज मरांडी कहते हैं कि सड़क की जरूरत को लेकर रिपोर्ट भेज दी गई है और जल्द समाधान की उम्मीद है। लेकिन गांव वाले पूछ रहे हैं—“क्या हर बार किसी प्रसूता को खाट पर ढोने के बाद ही फाइल आगे बढ़ेगी?”
पारसनाथ की तलहटी में बसे ये 10 टोले आज भी इंतजार कर रहे हैं—सड़क का, सिस्टम का, और उस ‘कृपा’ का… जो शायद अभी कहीं फाइलों में अटकी हुई है।