शेखपुरा: एक छत… जहां उम्र के आखिरी पड़ाव पर सहारा मिलता था। एक परिवार… जहां खून का रिश्ता नहीं, लेकिन अपनापन था। लेकिन अब वो सब सिर्फ याद बनकर रह गया है। आश्रम के बंद होते ही वहां रह रहे बुजुर्गों की जिंदगी अचानक अनिश्चितता में धकेल दी गई है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—अब इन बुजुर्गों का क्या होगा? जिनके अपने उन्हें छोड़ चुके थे, उन्हें इस आश्रम ने सहारा दिया था। अब आश्रम बंद होने के बाद कई बुजुर्ग फिर से बेसहारा हो गए हैं। कुछ को जल्दबाजी में दूसरी जगह शिफ्ट करने की बात कही जा रही है, लेकिन कई ऐसे भी हैं जिन्हें अब तक कोई ठिकाना नहीं मिला।
एक बुजुर्ग की आंखों में आंसू थे। उन्होंने धीमी आवाज में कहा, “यहां हमें अपना घर मिल गया था… अब फिर से कहां जाएं?”
वहीं, इस आश्रम से जुड़े स्टाफ की पीड़ा भी कम नहीं है। सालों से सेवा कर रहे कर्मचारियों के सामने अब रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। एक कर्मचारी ने बताया, “हमने इन्हें अपने मां-बाप की तरह सेवा दी… अब नौकरी भी चली गई और ये लोग भी बिछड़ गए।”
किसी ने बच्चों की फीस का जिक्र किया, तो किसी ने घर का किराया भरने की चिंता जताई। साफ है कि इस फैसले ने सिर्फ बुजुर्गों ही नहीं, बल्कि कई परिवारों की जिंदगी हिला दी है।
अब सबसे अहम सवाल—आखिर आश्रम बंद क्यों हुआ? क्या दान (डोनेशन) की कमी ने इसे बंद कराया या फिर सरकार की नीतियों ने इसे मजबूर कर दिया? अगर आर्थिक संकट था, तो समय रहते मदद क्यों नहीं दी गई?
सरकार और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। समाज कल्याण विभाग आखिर कहां था जब यह आश्रम संकट में था? क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्था पहले से नहीं की जानी चाहिए थी?
लोग पूछ रहे हैं—क्या हमारे सिस्टम में बुजुर्गों की कोई कीमत नहीं है? चुनाव के वक्त वादे होते हैं, योजनाएं गिनाई जाती हैं, लेकिन जब सच में सहारे की जरूरत होती है, तो व्यवस्था क्यों गायब हो जाती है?
यह सिर्फ एक आश्रम के बंद होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस संवेदनहीन सिस्टम की तस्वीर है, जहां बुजुर्गों की जिंदगी फाइलों में सिमटकर रह जाती है।
अब देखना होगा कि सरकार जागती है या फिर ये बुजुर्ग यूं ही अपने हाल पर छोड़ दिए जाएंगे।
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