पटना: पत्नी को किसी दूसरे पुरुष के साथ कथित ‘आपत्तिजनक स्थिति’ में देखना अपने आप में अवैध संबंध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। पटना हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई करते हुए यह अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि ‘आपत्तिजनक स्थिति’ और ‘शारीरिक संबंध’ दो अलग-अलग बातें हैं। ठोस साक्ष्य के बिना केवल आरोप या संदेह के आधार पर व्यभिचार साबित नहीं किया जा सकता।
मामला समस्तीपुर के एक व्यक्ति और मधुबनी की महिला से जुड़ा है। दोनों की शादी 2 जुलाई 2006 को हुई थी। वर्ष 2010 में उनके एक बेटा हुआ। शुरुआत में वैवाहिक जीवन सामान्य रहा, लेकिन बाद में दोनों के बीच विवाद बढ़ गया।
पति ने पत्नी पर लगाया था गंभीर आरोप
पति का आरोप था कि उसकी पत्नी का अपनी बड़ी बहन के पति यानी जीजा के साथ कथित अवैध संबंध था। उसका दावा था कि उसने दोनों को एक बार आपत्तिजनक स्थिति में देखा था। पति के मुताबिक, जब उसने इसका विरोध किया तो पत्नी के व्यवहार में बदलाव आया और उसके साथ कथित रूप से क्रूरता की जाने लगी।
पति ने इन्हीं आरोपों को आधार बनाकर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i) और 13(1)(ia) के तहत तलाक की मांग की। दूसरी ओर, पत्नी ने अवैध संबंध के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया और इसे मनगढ़ंत बताया।
पत्नी ने अदालत को यह भी बताया कि विवाद खत्म करने के लिए स्थानीय स्तर पर पंचायती हुई थी और समझौते की कोशिश की गई थी। उसका दावा था कि पति की ओर से लगाए गए चरित्र संबंधी आरोप ही उसके लिए मानसिक क्रूरता के समान हैं।
फैमिली कोर्ट के बाद हाईकोर्ट पहुंचा मामला
मधुबनी फैमिली कोर्ट ने 4 अप्रैल 2024 को पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद पति ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी।
3 सितंबर 2026 को जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट ने क्यों नहीं दिया तलाक?
कोर्ट ने माना कि पति पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध होने का ठोस प्रमाण पेश नहीं कर सका। केवल कथित आपत्तिजनक स्थिति को देखकर अवैध संबंध का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि पति ने इस कथित घटना को लेकर पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी और न ही उसके माता-पिता या अन्य रिश्तेदारों की ओर से आरोप की पुष्टि हुई।
अदालत के अनुसार, व्यभिचार जैसे गंभीर आरोपों में परिस्थितिजन्य साक्ष्य महत्वपूर्ण होते हैं। केवल शक, संभावना या एक पक्ष के बयान के आधार पर इसे साबित नहीं माना जा सकता।
क्या है इस फैसले की बड़ी बात?
इस मामले ने साफ किया कि वैवाहिक विवाद में चरित्र पर गंभीर आरोप लगाने मात्र से तलाक का आधार तैयार नहीं हो जाता। जिस पक्ष की ओर से व्यभिचार का आरोप लगाया जा रहा है, उसे अदालत के सामने विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए अपने दावे को साबित करना होगा।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि जब कथित अवैध संबंध ही पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुआ, तो उसी आरोप के आधार पर लगाए गए क्रूरता के दावे को भी इस मामले में तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।
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