नालंदा: नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर मनमाने प्रतिबंध लगाने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने नालंदा जिला प्रशासन के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने तत्कालीन जिलाधिकारी कुंदन कुमार के उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसके तहत दो स्थानीय नागरिकों को ‘असामाजिक तत्व’ मानते हुए कई पाबंदियां लगाई गई थीं।
न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ ने राज्य सरकार को दोनों पीड़ितों को एक-एक लाख रुपये मुआवजा और 10-10 हजार रुपये मुकदमा खर्च देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मुआवजे की राशि जिम्मेदार अधिकारियों से नियमानुसार वसूली जाए।
‘कट एंड पेस्ट’ जैसे आदेश पर कोर्ट नाराज
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रशासनिक कार्रवाई के तरीके पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने पाया कि जिलाधिकारी के आदेशों में ठोस तथ्यों और स्वतंत्र जांच के बजाय पुराने और सामान्य शब्दों को दोहराया गया है।
पीठ ने कहा कि आदेश में ‘न्यायिक सोच का घोर अभाव’ दिखाई देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिहार अपराध नियंत्रण कानून जैसे कठोर प्रावधानों का इस्तेमाल किसी नागरिक की स्वतंत्रता सीमित करने के लिए महज प्रशासनिक औपचारिकता की तरह नहीं किया जा सकता।
विधानसभा चुनाव और छठ के दौरान शांति भंग होने की आशंका बताई थी
मामला कतरीसराय थाना क्षेत्र के कटौना गांव निवासी शशि कुमार उर्फ फुकन और अजय सिंह से जुड़ा है। पुलिस अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर दोनों को बिहार अपराध नियंत्रण कानून, 2024 की धारा 3(3) के तहत कार्रवाई के दायरे में लाया गया था।
प्रशासन की ओर से आशंका जताई गई थी कि विधानसभा चुनाव और छठ पर्व के दौरान दोनों के स्वतंत्र रूप से घूमने से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। सितंबर 2025 में दोनों को कारण बताओ नोटिस दिया गया। इसके बाद जिलाधिकारी ने उन पर कई प्रतिबंध लगा दिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि कार्रवाई के लिए जरूरी कानूनी आधार ही पूरा नहीं होता था।
24 महीने में दो मामलों की शर्त पूरी नहीं हुई
कोर्ट ने बिहार अपराध नियंत्रण कानून, 2024 के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को ‘असामाजिक तत्व’ मानने के लिए कानून में निर्धारित शर्तों का पालन जरूरी है।
मामले में अदालत ने पाया कि संबंधित 24 महीने की अवधि में दोनों के खिलाफ केवल एक मामले में चार्जशीट दाखिल हुई थी। यह मामला खनन और पर्यावरण नियमों से जुड़ा था। इसके बावजूद प्रशासन ने कार्रवाई की।
कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि एक गोपनीय सनहा के आधार पर इतनी कठोर कार्रवाई कैसे की गई।
40 किलोमीटर दूर थाने में हाजिरी का आदेश
जिलाधिकारी के आदेश में दोनों नागरिकों को उनके नजदीकी थाने के बजाय करीब 40 किलोमीटर दूर सिलाव थाने में सप्ताह में तीन दिन—सोमवार, बुधवार और शुक्रवार—हाजिरी लगाने का निर्देश दिया गया था।
इसके अलावा थाना क्षेत्र की सीमा से बाहर जाने पर भी प्रतिबंध लगाया गया था। हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था पर भी सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि संबंधित नियमों के अनुसार रिपोर्टिंग के लिए नजदीकी थाने का प्रावधान है।
कोर्ट ने माना कि इन पाबंदियों के कारण दोनों नागरिकों को करीब तीन महीने तक अपने घर, परिवार और आजीविका से गंभीर परेशानी उठानी पड़ी।
हाईकोर्ट ने प्रशासन को कानून के तहत अधिकारों का इस्तेमाल करते समय ठोस तथ्यों, निष्पक्ष जांच और न्यायसंगत संतुष्टि सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया।
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