लखीसराय: छात्रों की समस्याओं और शिकायतों के त्वरित समाधान के नाम पर मंगलवार को जिले के 24 शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थी सहयोग शिविर आयोजित किए जाने का दावा किया गया। प्रशासन की ओर से बाकायदा 24 संस्थानों की सूची जारी की गई और बताया गया कि शिविर में प्राप्त आवेदनों का निष्पादन किया गया। लेकिन इसी दावे के बीच अब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—अगर 24 जगह शिविर लगे तो तस्वीर सिर्फ एक संस्थान की ही क्यों?
उपलब्ध जानकारी में शिविर के नाम पर उच्च माध्यमिक विद्यालय सह आदर्श डिग्री कॉलेज, परसावां की तस्वीर सामने आई है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि बाकी 23 संस्थानों में वास्तव में क्या हुआ? कितने विद्यार्थी पहुंचे? कितनी शिकायतें मिलीं? कितनी शिकायतों का मौके पर समाधान हुआ? और कितनी शिकायतों को सिर्फ कागज पर दर्ज कर आगे बढ़ा दिया गया?
24 संस्थान, लेकिन सबूत के नाम पर एक तस्वीर
जिला प्रशासन की ओर से जारी सूची में KGBV से लेकर कॉलेज, पॉलिटेक्निक, इंजीनियरिंग कॉलेज, आईटीआई, छात्रावास और डिग्री कॉलेज तक कुल 24 संस्थानों को शामिल किया गया है।
लेकिन इतने बड़े आयोजन के बावजूद सार्वजनिक तौर पर शिविर की तस्वीर के रूप में सिर्फ एक संस्थान की तस्वीर सामने आना कई सवाल खड़े करता है। क्या बाकी संस्थानों में भी उसी तरह विद्यार्थियों के साथ संवाद हुआ या सिर्फ रिपोर्ट तैयार कर खानापूर्ति कर दी गई?
अगर शिविर वास्तव में सभी 24 संस्थानों में हुआ है तो प्रशासन को प्रत्येक संस्थान की कार्रवाई रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए।
जिस समस्या के समाधान का दावा, वही शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी हकीकत
विद्यार्थी सहयोग शिविर में जिन समस्याओं को सुनने और दूर करने का दावा किया गया है, उनमें शिक्षकों का समय पर कक्षा में नहीं पहुंचना, शिक्षकों की अनुपस्थिति, परीक्षा समय पर नहीं होना, परीक्षाफल में देरी, अनधिकृत शुल्क, बिजली, बैठने की व्यवस्था, प्रयोगशाला, पेयजल, शौचालय और साफ-सफाई जैसी समस्याएं शामिल हैं।
सवाल यह है कि जब सरकार को खुद पता है कि ये समस्याएं मौजूद हैं, तो इनके स्थायी समाधान के लिए शिविर के बजाय नियमित निगरानी और जवाबदेही क्यों नहीं तय की जाती?
एक दिन शिविर लगाकर शिकायत सुन लेने से क्या अगले दिन से शिक्षक नियमित हो जाएंगे? क्या कॉलेजों में अचानक प्रयोगशालाएं तैयार हो जाएंगी? क्या जर्जर भवन दुरुस्त हो जाएंगे? क्या विद्यार्थियों को नियमित कक्षाएं मिलनी शुरू हो जाएंगी?
नामांकन है, छात्र नहीं; छात्र हैं तो शिक्षक नहीं!
जिले की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जमीनी तस्वीर इससे कहीं ज्यादा गंभीर होने का दावा किया जा रहा है। कहीं नामांकन तो है, लेकिन विद्यार्थी नियमित कक्षा में नहीं पहुंचते। कहीं विद्यार्थी हैं तो पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। और जहां शिक्षक और विद्यार्थी दोनों मौजूद हैं, वहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव शिक्षा की राह में बाधा बना हुआ है।
ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार समस्या की जड़ पर काम कर रही है या शिकायत सुनने के लिए महीने में एक दिन का कार्यक्रम आयोजित कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान रही है?
छात्र आंदोलन से घबराई सरकार या सच में समाधान की कोशिश?
राज्य में शिक्षा और विद्यार्थियों से जुड़े मुद्दों पर लगातार आवाज उठती रही है। ऐसे समय में विद्यार्थी सहयोग शिविर की शुरुआत को लेकर विपक्ष और छात्र संगठनों की ओर से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार छात्र असंतोष को कम करने के लिए संवाद का रास्ता अपना रही है?
अगर सरकार की मंशा वास्तव में छात्रों की समस्याओं का समाधान करना है तो सिर्फ शिविर लगाना पर्याप्त नहीं होगा। शिकायत से लेकर समाधान तक की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी करनी होगी।
प्रशासन बताए—24 शिविरों में कितनी शिकायतें मिलीं?
अब सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासन से है—
24 संस्थानों में कितने विद्यार्थी पहुंचे?
कुल कितनी शिकायतें दर्ज हुईं?
कितनी शिकायतों का मौके पर समाधान हुआ?
कितनी शिकायतें लंबित हैं?
किस अधिकारी को किस समस्या के समाधान की जिम्मेदारी दी गई?
और अगली समीक्षा में कितने मामलों का समाधान दिखेगा?
अगर इन सवालों के जवाब सार्वजनिक कर दिए जाएं तो विद्यार्थी सहयोग शिविर की वास्तविक तस्वीर खुद सामने आ जाएगी।
तस्वीर से ज्यादा जरूरी है जमीनी बदलाव
विद्यार्थियों को मंच पर बैठाकर शिकायत सुनना अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था की असली परीक्षा स्कूल-कॉलेज की कक्षाओं में होती है।
बच्चों को फोटो नहीं, पढ़ाई चाहिए।
शिविर नहीं, नियमित कक्षा चाहिए।
आश्वासन नहीं, शिक्षक चाहिए।
कागजी रिपोर्ट नहीं, प्रयोगशाला और पुस्तकालय चाहिए।
और शिकायत दर्ज होने की रसीद नहीं, समस्या का समाधान चाहिए।
लखीसराय में 24 शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थी सहयोग शिविर आयोजित होने के प्रशासनिक दावे के बीच सिर्फ एक संस्थान की तस्वीर सामने आना भले ही अपने आप में अनियमितता का प्रमाण न हो, लेकिन यह पारदर्शिता पर गंभीर सवाल जरूर खड़ा करता है। अब प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह बाकी 23 संस्थानों में आयोजित शिविरों की तस्वीर, उपस्थिति, शिकायतों और समाधान की स्थिति सार्वजनिक करे।
क्योंकि कागज पर 24 शिविर लगाना आसान है, लेकिन 24 संस्थानों की शिक्षा व्यवस्था बदलना असली चुनौती है।
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