औरंगाबाद/रोहतास: बिहार में कानून-व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। डेहरी-डालमियानगर नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी विमल कुमार की औरंगाबाद में जिस बेरहमी से हत्या की गई, उसने सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर सीधा प्रहार कर दिया है। अगर एक जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी ही सड़क पर सुरक्षित नहीं है, तो आम जनता की सुरक्षा का क्या भरोसा?
देर रात पटना लौट रहे अधिकारी की गाड़ी रोककर अपराधियों ने पहले उन्हें बाहर खींचा, फिर लोहे की रॉड और धारदार हथियार से हमला कर मौत के घाट उतार दिया। वारदात का तरीका इतना संगठित और खौफनाक था कि इसे सुनकर हर कोई सन्न है। शुरुआती जानकारी में गोली मारने की बात भी सामने आई, लेकिन इसकी पुष्टि अभी बाकी है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि घटना के बाद भी प्रशासन के पास साफ जवाब नहीं है—ना हत्या की वजह स्पष्ट है और ना ही अपराधियों का कोई ठोस सुराग सामने आया है। ड्राइवर को हिरासत में लेकर पूछताछ जरूर की जा रही है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ एक हत्या है या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश?
इस घटना ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है। लगातार हो रही आपराधिक घटनाओं के बीच यह वारदात सरकार के “सुशासन” के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है। क्या बिहार में अपराधियों का मनोबल इतना बढ़ गया है कि अब अफसर भी निशाने पर हैं?
स्थानीय लोगों में डर और गुस्सा दोनों है। लोगों का कहना है कि अगर प्रशासनिक अधिकारी तक सुरक्षित नहीं हैं, तो आम आदमी किस भरोसे जिए?
फिलहाल पुलिस जांच में जुटी है और जल्द खुलासे का दावा कर रही है, लेकिन इस सनसनीखेज हत्या ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है—क्या बिहार में कानून का डर खत्म हो चुका है?
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