पटना: बिहार स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पर पटना हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए दो मेडिकल अधिकारियों की बर्खास्तगी के आदेश रद्द कर दिए। कोर्ट ने कहा कि विभागीय कार्रवाई में उचित जांच और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन जरूरी है।
मामला डॉ. अशोक कुमार प्रसाद और डॉ. मो. इशरत हुसैन से जुड़ा है। दोनों पर लंबे समय तक कथित अनधिकृत अनुपस्थिति को लेकर विभागीय कार्रवाई की गई थी। हाईकोर्ट के जस्टिस कुमार मनीष की एकल पीठ ने सुनवाई के बाद संबंधित बर्खास्तगी आदेशों को रद्द कर दिया।
गवाहों की जांच और विभागीय प्रक्रिया पर उठे सवाल
कोर्ट के समक्ष यह बात सामने आई कि विभागीय जांच में आरोपों को साबित करने के लिए मौखिक गवाहों की जांच नहीं की गई। साथ ही, डॉक्टरों को जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराने और अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिए जाने से जुड़ी प्रक्रिया पर भी सवाल उठे।
रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों मामलों में एकतरफा जांच की गई थी। कोर्ट ने ऐसी प्रक्रिया को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना और संबंधित बर्खास्तगी आदेशों को कायम रखने से इनकार कर दिया।
3 महीने के भीतर बहाली का आदेश
हाईकोर्ट ने दोनों डॉक्टरों को तीन महीने के भीतर सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। बर्खास्तगी की अवधि के वेतन और सेवा संबंधी लाभों का निर्धारण सक्षम प्राधिकारी को कानून के अनुसार करना होगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार चाहे तो नियमों का पालन करते हुए और संबंधित डॉक्टरों को उचित सुनवाई का अवसर देकर मामले में नए सिरे से कार्रवाई कर सकती है।
फैसले का संदेश
इस फैसले में हाईकोर्ट ने यह रेखांकित किया कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते समय निर्धारित प्रक्रिया और सुनवाई का अधिकार महत्वपूर्ण है। केवल एकतरफा विभागीय प्रक्रिया के आधार पर कठोर दंड देना न्यायिक जांच में टिकाऊ नहीं माना गया।
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