रांची: राजधानी के रातू रोड स्थित मधुकम क्षेत्र के बहुचर्चित जमीन विवाद में झारखंड हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति राजेश शंकर की अदालत ने वहां वर्षों से रह रहे 12 गैर-आदिवासी परिवारों को राहत देते हुए वर्ष 2024 के उस आदेश को शून्य करार दिया, जिसके आधार पर जमीन का कब्जा दिलाने और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू हुई थी।
अदालत ने पाया कि उक्त आदेश महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर प्राप्त किया गया था, इसलिए उसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं है। साथ ही, याचिकाकर्ता महादेव उरांव पर 12 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि यह राशि चार सप्ताह के भीतर 12 प्रभावित परिवारों को एक-एक लाख रुपये के रूप में दी जाए।
मामला आर.एस. प्लॉट संख्या-319, खाता संख्या-179 की लगभग 45 डिसमिल जमीन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का दावा था कि यह जमीन उन्हें छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT एक्ट) की धारा 71ए के तहत वर्ष 1996 में वापस मिली थी। इसके बावजूद कब्जा नहीं मिलने पर उन्होंने 2024 में हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर अदालत ने संबंधित अंचल अधिकारी को कब्जा दिलाने का निर्देश दिया था।
अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान 12 परिवारों ने हस्तक्षेप करते हुए अदालत को बताया कि वर्ष 2019-2020 के बीच याचिकाकर्ता ने उनसे 11 समझौते किए थे। इन समझौतों के तहत उन्हें जमीन पर रहने की अनुमति दी गई थी और इसके एवज में लगभग 1.08 करोड़ रुपये चेक के माध्यम से लिए गए थे। अदालत ने पाया कि इन तथ्यों का उल्लेख याचिका में नहीं किया गया था।
कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता ने पहले ही समझौते कर लिए थे, तो उन्हें यह तथ्य याचिका में बताना आवश्यक था। महत्वपूर्ण जानकारी छिपाकर प्राप्त आदेश को अदालत ने शून्य माना।
याचिकाकर्ता द्वारा समझौते दबाव में किए जाने की दलील भी अदालत ने खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसा था, तो उन्हें उचित कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए थी, जो नहीं की गई।
इसके अलावा, अदालत ने हेहल के तत्कालीन अंचल अधिकारी की कार्यशैली पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि आदेश में कहीं भी संरचना तोड़ने का निर्देश नहीं था, इसके बावजूद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई, जो उचित नहीं है।
अदालत ने संबंधित अधिकारी को भविष्य में सावधानी बरतने की चेतावनी दी है।
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