पटना: बिहार की सियासत में 15 जुलाई एक अहम तारीख बनने जा रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी छात्र सम्मेलन के बहाने पटना आ रहे हैं, लेकिन असल मकसद इससे कहीं बड़ा है—बिहार में पार्टी को फिर से खड़ा करना। हाल के चुनावी झटके के बाद यह दौरा कांग्रेस के लिए “रीबूट” की तरह देखा जा रहा है।
2025 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का ग्राफ तेजी से गिरा और पार्टी 19 सीटों से सिमटकर महज 6 सीटों पर आ गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ हार नहीं, बल्कि संगठन की कमजोरी का संकेत है। ऐसे में राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—जमीन पर पार्टी को दोबारा खड़ा करना।
पटना दौरे के दौरान राहुल गांधी युवाओं और छात्रों से संवाद पर फोकस कर रहे हैं। पार्टी पहले ही “छात्रों की गूंज” जैसे अभियान के जरिए युवाओं को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। माना जा रहा है कि बिहार में भी इसी फार्मूले को आजमाया जाएगा।
हालांकि राह आसान नहीं है। एक तरफ कांग्रेस का कमजोर जनाधार है, तो दूसरी तरफ पार्टी के अंदर ही गुटबाजी खुलकर सामने आ रही है। बड़े नेताओं के बीच खींचतान ने संगठन को और कमजोर किया है।
इसी बीच बिहार की सत्ता में उभरे नए चेहरे सम्राट चौधरी की आक्रामक राजनीति भी राहुल गांधी के लिए बड़ी चुनौती मानी जा रही है। बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस को नई रणनीति और तेज तेवर दोनों की जरूरत है।
साथ ही, लालू-तेजस्वी के साथ गठबंधन को लेकर भी कांग्रेस के भीतर असमंजस बना हुआ है। पार्टी के कई नेता अब “अकेले चलने” की वकालत कर रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में महागठबंधन की दिशा भी बदल सकती है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि राहुल गांधी का यह दौरा सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बिहार में कांग्रेस के भविष्य की दिशा तय करेगा। अगर यहां से पार्टी को नई ऊर्जा मिलती है, तो वापसी की राह बन सकती है, वरना बिहार में कांग्रेस और हाशिए पर जा सकती है।
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