सहरसा: बिहार में शिक्षा व्यवस्था सुधारने के दावों के बीच सहरसा के महिषी प्रखंड से सामने आई तस्वीर कई सवाल खड़े करती है। नवसृजित प्राथमिक विद्यालय (एनपीएस) कुंदह तक पहुंचने के लिए शिक्षक रोज कमरभर पानी पार करने को मजबूर हैं। स्कूल चारों तरफ से बाढ़ के पानी से घिरा है और बच्चों की पढ़ाई पक्के भवन में नहीं, बल्कि टीन के शेड के नीचे दरी पर हो रही है।
विद्यालय में कक्षा एक से पांच तक 202 बच्चे नामांकित हैं। लेकिन इनके लिए न पक्का स्कूल भवन है, न बिजली की सुविधा और न ही बारिश से बचने का पुख्ता इंतजाम। टीन की छत से पानी टपकने के कारण बारिश के दौरान पढ़ाई प्रभावित हो जाती है। ऐसे में सवाल सिर्फ स्कूल की बदहाली का नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार का भी है।
स्कूल तक पहुंचना रोज बन रही चुनौती
कुंदह गांव में बाढ़ का पानी चारों तरफ फैला हुआ है। विद्यालय तक पहुंचने वाला मुख्य रास्ता पूरी तरह जलमग्न हो चुका है। दूर से आने वाले शिक्षकों के लिए स्कूल तक पहुंचना रोज जोखिम भरा काम बन गया है।
विद्यालय में वर्तमान में छह शिक्षक पदस्थापित हैं। प्रभारी प्रधानाध्यापिका के रूप में प्रेमलता देवी विद्यालय का संचालन कर रही हैं। शिक्षकों को कमरभर पानी से होकर स्कूल पहुंचना पड़ता है। पानी की गहराई और रास्ते की स्थिति के कारण हर दिन हादसे की आशंका बनी रहती है।
रास्ता ऐसा कि दो HM ने नहीं किया योगदान
स्कूल की बदहाल पहुंच व्यवस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूर्व में यहां पदस्थापित किए गए दो प्रधानाध्यापकों ने योगदान ही नहीं दिया। रास्ते की स्थिति और जलजमाव के कारण उन्होंने स्कूल जॉइन नहीं किया।
अब विद्यालय प्रभारी प्रधानाध्यापिका और छह शिक्षकों के भरोसे चल रहा है। शिक्षक अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियां लंबे समय तक जारी रहना सुरक्षित नहीं है।
टीन की टपरी के नीचे 202 बच्चों की पढ़ाई
विद्यालय की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ रास्ता नहीं है। स्कूल के पास अपना पक्का भवन भी नहीं है। 202 बच्चे टीन शेड के नीचे दरी पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं।
गर्मी और उमस में टीन की छत के नीचे बैठना बच्चों के लिए मुश्किल होता है। वहीं बारिश शुरू होते ही टीन की छत से पानी टपकने लगता है। ऐसे में कक्षा संचालन प्रभावित होता है और बच्चों को पढ़ाई के बजाय मौसम की मार झेलनी पड़ती है।
विद्यालय में बिजली कनेक्शन भी नहीं है। यानी एक तरफ बाढ़ और दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं की कमी—दोनों के बीच बच्चों की पढ़ाई जारी है।
बच्चे किसी तरह पहुंचते हैं, शिक्षकों के लिए रोज परीक्षा
गांव के बच्चों का विद्यालय तक पहुंचना अपेक्षाकृत आसान है क्योंकि वे आसपास के टोले-मुहल्ले से आते हैं। लेकिन दूसरे इलाकों से आने वाले शिक्षकों के लिए हर दिन पानी पार कर स्कूल पहुंचना बड़ी चुनौती है।
शिक्षकों और ग्रामीणों ने इस स्थिति से शिक्षा विभाग को लिखित रूप से अवगत कराया है। उनका कहना है कि समस्या की जानकारी देने के बावजूद अब तक विद्यालय को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित या टैग करने की दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है।
हादसे का इंतजार या समाधान की पहल?
स्थानीय लोगों और शिक्षकों की मांग है कि किसी अप्रिय घटना का इंतजार करने के बजाय प्रशासन तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था करे। बाढ़ की स्थिति में बच्चों और शिक्षकों की सुरक्षा को देखते हुए स्कूल संचालन के लिए सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने या अन्य व्यावहारिक व्यवस्था करने की जरूरत है।
महिषी के कुंदह की यह तस्वीर सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने लाती है जो बाढ़ के मौसम में ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े हो जाते हैं। जब शिक्षक कमरभर पानी पार करके स्कूल पहुंचें और 202 बच्चे टीन की छत के नीचे दरी पर पढ़ें, तो सवाल सिर्फ सुविधा का नहीं—व्यवस्था की प्राथमिकता का भी है।
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