धनबाद: झारखंड की राजनीति में अचानक सन्नाटा छा गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री मन्नान मल्लिक अब इस दुनिया में नहीं रहे। रांची के निजी अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। 83 साल की उम्र में उनका जाना सिर्फ एक व्यक्ति का निधन नहीं, बल्कि एक पूरे दौर के खत्म होने जैसा माना जा रहा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उनके निधन से महज चार दिन पहले ही अदालत ने बहुचर्चित मटकुरिया गोलीकांड मामले में उन्हें तीन साल की सजा सुनाई थी। सजा, बीमारी और फिर अचानक मौत—इन सबने इस खबर को और ज्यादा चर्चा में ला दिया है।
धनबाद की सियासत में मन्नान मल्लिक एक ऐसा नाम थे, जिनकी पकड़ जमीनी स्तर तक थी। 2009 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने और फिर हेमंत सोरेन सरकार में मंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। लेकिन उनकी पहचान सिर्फ सत्ता तक सीमित नहीं रही—वे हमेशा आम लोगों, खासकर मजदूरों की आवाज बनकर सामने आए।
कोयलांचल की धरती पर मजदूर राजनीति में उनका कद बेहद बड़ा था। राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ और यूनियनों में उनकी मजबूत पकड़ थी। बीसीसीएल के मजदूरों के बीच वे भरोसे का नाम माने जाते थे। मजदूरों के अधिकार, वेतन और सुरक्षा को लेकर उनकी लड़ाई उन्हें भीड़ से अलग बनाती थी।
उनका राजनीतिक सफर भी दिलचस्प रहा। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर के निजी सचिव के रूप में की थी। वहीं से उन्होंने राजनीति की बारीकियां सीखीं और बाद में खुद एक मजबूत नेता के रूप में उभरे। धनबाद जिला कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने संगठन को लंबे समय तक संभाला।
मटकुरिया गोलीकांड का मामला भी उनके जीवन से जुड़ा एक अहम अध्याय रहा। 2011 में हुए इस मामले में पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच हिंसक झड़प में चार लोगों की मौत हुई थी। 15 साल बाद आए फैसले में उन्हें दंगा और आगजनी जैसे मामलों में दोषी ठहराया गया, लेकिन गंभीर धाराओं से बरी कर दिया गया था।
अब जब वे नहीं रहे, तो उनके समर्थकों और राजनीतिक सहयोगियों के बीच गहरा दुख है। हर कोई उन्हें एक सरल, मिलनसार और जमीनी नेता के रूप में याद कर रहा है।
मन्नान मल्लिक का जाना झारखंड की राजनीति के लिए एक बड़ा झटका है। उनके साथ एक ऐसा चेहरा चला गया, जो सत्ता में रहते हुए भी जमीन से जुड़ा रहा—और शायद यही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी।