पटना: बिहार की राजधानी पटना में शनिवार सुबह जो घटनाक्रम सामने आया, वह सिर्फ एक मुलाकात नहीं बल्कि कई परतों में छिपी हुई सियासी हलचल का संकेत माना जा रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह जब अपने समर्थकों के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आवास पहुंचे, तो यह मुलाकात जितनी सामान्य दिखी, उतनी ही असामान्य उसकी अंदरूनी कहानी बताई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, आरसीपी सिंह को पहले से ही यह संकेत था कि यह मुलाकात तुरंत संभव नहीं होगी, क्योंकि आवास परिसर में मौजूद कुछ संगठनात्मक स्तर के नेताओं और अधिकारियों की भूमिका को लेकर पहले से ही असंतोष की स्थिति थी। इसी वजह से उनके समर्थकों के साथ 20 मिनट का इंतजार हुआ, जिसने माहौल को धीरे-धीरे तनावपूर्ण बना दिया।
अंदरखाने की जानकारी के मुताबिक, जदयू के कुछ प्रभावशाली MLC स्तर के नेताओं की मौजूदगी को लेकर पहले से ही असहमति थी। समर्थकों का आरोप है कि इन्हीं लोगों ने मुलाकात को लेकर प्रक्रिया को प्रभावित किया और RCP को सीधे मुख्यमंत्री से मिलने से रोकने की कोशिश की।
सूत्र यह भी बताते हैं कि यह मुलाकात पूरी तरह “अनौपचारिक” और “सीमित समय” के लिए तय थी, लेकिन समर्थकों की बड़ी संख्या और अंदर मौजूद राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण इसे नियंत्रित रखना मुश्किल हो गया।
जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने कमरे से बाहर आए, तो यह मुलाकात कुछ सेकंड की औपचारिकता तक सीमित रही। यही छोटा सा दृश्य—अभिवादन और बिना संवाद के अंदर जाना—ही बाद में राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन गया।
अंदरखाने यह भी चर्चा है कि यह मुलाकात केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे संगठनात्मक स्तर पर पुराने संबंधों और भविष्य की संभावनाओं की परख भी शामिल थी। हालांकि किसी भी पक्ष ने आधिकारिक तौर पर इस बात की पुष्टि नहीं की है।
आरसीपी सिंह, जो कभी जदयू के शीर्ष रणनीतिकारों में गिने जाते थे, उनके अचानक राजनीतिक उतार-चढ़ाव और पार्टी से बाहर होने की कहानी भी इस मुलाकात की पृष्ठभूमि में गहराई जोड़ती है। 2022 में उनके पार्टी से अलग होने के बाद संबंधों में आई दूरी अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
सूत्रों का कहना है कि समर्थकों की नाराजगी सिर्फ मुलाकात न होने को लेकर नहीं थी, बल्कि यह भी संदेश देने की कोशिश थी कि आरसीपी सिंह का एक अलग राजनीतिक आधार अभी भी मौजूद है। इसी वजह से परिसर के बाहर नारेबाजी और हंगामे का माहौल बन गया।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम एक “टेस्ट ऑफ पॉलिटिकल सिग्नल्स” था—जहां न तो पूरी तरह दरवाजे खुले हैं और न ही पूरी तरह बंद। यही वजह है कि इस मुलाकात को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आ रही हैं।
फिलहाल दोनों पक्षों की ओर से कोई औपचारिक बयान नहीं आया है, लेकिन पटना की सियासत में यह घटना आने वाले दिनों में नए समीकरणों की चर्चा को और तेज कर सकती है।
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