आरा (बिहार): भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले ने अब पूरे बिहार की सियासत और पुलिस व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। लगातार उठ रहे विवाद, मीडिया रिपोर्ट्स और जनदबाव के बीच बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस मामले की न्यायिक जांच कराने का आदेश दे दिया है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि जांच पटना हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की निगरानी में होगी, ताकि घटना के हर पहलू की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो सके। अब यह जांच तय करेगी कि भरत तिवारी की मौत असली पुलिस मुठभेड़ का परिणाम थी या फिर एक सोची-समझी हत्या।
यह पूरा घटनाक्रम 17 जून की सुबह भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव से शुरू होता है। पुलिस के अनुसार, उन्हें सूचना मिली थी कि भरत तिवारी के पास अवैध हथियार है। इसी आधार पर सुबह करीब 5 बजे पुलिस टीम उसके घर पहुंची।
पुलिस का दावा है कि दरवाजा खुलते ही भरत उग्र हो गया और पिस्टल से फायरिंग की कोशिश की। इसके बाद वह छत पर चढ़ गया और पुलिस टीम पर कई राउंड गोलियां चलाईं। हालांकि, किसी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई।
इसके बाद पुलिस ने इलाके की घेराबंदी कर दी। करीब 8:30 बजे के आसपास पुलिस का कहना है कि भरत हथियार लेकर भागने लगा और पीछा करने पर उसने फिर फायरिंग की। जवाब में पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चलाई, जो उसके पैर में लगी।
घायल हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां बाद में उसकी मौत हो गई।
घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल भरत के परिवार की ओर से उठाया गया। उसकी मां ने आरोप लगाया कि भरत ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया था और हथियार भी फेंक दिया था। इसके बावजूद पुलिस ने उसे गोली मार दी।
मां ने आवेदन देकर संबंधित पुलिस अधिकारियों—DSP और थानाध्यक्ष—के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की है। हालांकि अब तक इस पर पुलिस की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
मामले में पुलिस ने दो अलग-अलग FIR दर्ज की हैं—
- पहली FIR में भरत, उसके पिता और भाई पर अवैध हथियार रखने, पुलिस पर फायरिंग और सरकारी कार्य में बाधा डालने का आरोप लगाया गया है।
- दूसरी FIR मुठभेड़ से जुड़ी है, जिसमें पुलिस ने आत्मरक्षा में कार्रवाई का दावा किया है।
इन FIRs को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं, खासकर परिजनों को आरोपी बनाए जाने को लेकर।
भरत की मौत के बाद बिलौटी गांव में आक्रोश फैल गया। ग्रामीणों ने NH-922 को जाम कर दिया और जमकर विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान पथराव और हंगामे की भी खबरें सामने आईं।
इस मामले में पुलिस ने 14 नामजद और करीब 50 अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है।
इस एनकाउंटर ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। कई नेताओं ने इसे फर्जी एनकाउंटर बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
- कुछ नेताओं ने इसे सीधे “हत्या” करार दिया
- वहीं, विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए
- मानवाधिकार आयोग में भी याचिका दायर की गई है
मामले में सामाजिक संगठनों और वकीलों ने स्वतंत्र SIT जांच की मांग भी उठाई है।
सरकार के आदेश के बाद अब यह मामला पूरी तरह न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है। रिटायर्ड जज की निगरानी में होने वाली जांच—
- पुलिस के दावों की सच्चाई परखेंगी
- परिजनों के आरोपों की जांच करेगी
- घटनास्थल और सबूतों का मूल्यांकन करेगी
सबसे अहम सवाल यही रहेगा—क्या यह मुठभेड़ कानून के तहत हुई या नियमों का उल्लंघन किया गया?
अब पूरे बिहार की नजर इस जांच पर टिकी है। रिपोर्ट आने के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि भरत तिवारी की मौत के पीछे असली कहानी क्या है और जिम्मेदार कौन है।
यह मामला सिर्फ एक एनकाउंटर नहीं, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और न्याय व्यवस्था की कसौटी बन चुका है।
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