मोतिहारी: नेपाल में आई भीषण तबाही का असर अब बिहार तक पहुंच चुका है। पूर्वी चंपारण में गंडक नदी उफान पर है और नदी किनारे बसे इलाकों में प्रशासन ने अलर्ट जारी किया है। एक तरफ नेपाल में तबाही का मंजर है, तो दूसरी तरफ इसी बाढ़ के पानी के साथ बहकर आई लकड़ियां अब गंडक किनारे रहने वाले लोगों के लिए आकर्षण का कारण बन गई हैं।
नेपाल की त्रासदी ने हजारों परिवारों की जिंदगी उजाड़ दी। घर, दुकान, वाहन और दूसरी संपत्तियां पानी के तेज बहाव में बह गईं। कई लोग अब भी लापता हैं और परिजन अपनों की तलाश में जुटे हैं। लेकिन इसी भयावह आपदा के बीच पूर्वी चंपारण में ‘आपदा में अवसर’ की तस्वीर भी सामने आई है।
गंडक में नेपाल से बहकर आई लकड़ियों को निकालने के लिए कुछ ग्रामीण तेज बहाव के बीच नदी में उतर रहे हैं। पानी में छानकर निकाली गई लकड़ियों को घाट पर जमा किया जा रहा है और फिर बैलगाड़ी के जरिए ग्रामीण उसे अपने घर ले जा रहे हैं।
कुछ लकड़ियों के लिए जिंदगी दांव पर!
नदी में उतरकर लकड़ी निकालने का यह सिलसिला देखने में भले ही रोजी-रोटी का जुगाड़ लगे, लेकिन गंडक के मौजूदा तेवर इसे बेहद जोखिम भरा बना रहे हैं। तेज धार में जरा सी चूक भारी पड़ सकती है।
खतरा सिर्फ पानी के बहाव तक सीमित नहीं है। वाल्मीकिनगर बराज और आसपास के जंगल क्षेत्र में मगरमच्छों की मौजूदगी की बात भी सामने आती रही है। ऐसे में नदी में उतरने वालों के सामने बाढ़ के साथ-साथ जलीय जीवों का जोखिम भी बना हुआ है।
एक तरफ त्रासदी, दूसरी तरफ पेट की जद्दोजहद
गंडक किनारे की यह तस्वीर आपदा की एक दूसरी कहानी भी दिखाती है। एक ओर नेपाल में आई तबाही का दर्द है, तो दूसरी ओर सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए रोजी-रोटी की चुनौती।
नेपाल से बहकर आई लकड़ियां किसी के लिए बेकार मलबा हो सकती हैं, लेकिन ग्रामीणों के लिए वही लकड़ी घर चलाने का जरिया बन रही है। हालांकि बड़ा सवाल यही है—क्या कुछ लकड़ियों के लिए उफनती गंडक में उतरना सुरक्षित है?
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