पटना: एक दौर था जब मोकामा की गलियों में सूरजभान सिंह का नाम ही काफी था। नाम के साथ जुड़ी बाहुबली की छवि, अपराध की दुनिया से जुड़े किस्से और फिर राजनीति में एंट्री—सूरजभान की जिंदगी बिहार की उस दौर की राजनीति की कहानी भी है, जब बाहुबल और सियासत का गठजोड़ अक्सर सुर्खियों में रहता था। आज वही सूरजभान सिंह चेन्नई के एक अस्पताल में भर्ती हैं।
करीब एक सप्ताह पहले पटना स्थित आवास पर सीने में तेज दर्द की शिकायत के बाद उनकी तबीयत बिगड़ी। उन्हें पहले पटना के अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके बाद बेहतर इलाज के लिए दिल्ली ले जाया गया और अब परिजन उन्हें चेन्नई ले गए हैं। फिलहाल उनका इलाज डॉक्टरों की निगरानी में चल रहा है।
फौज में जाना था, लेकिन रास्ता बदल गया
5 मार्च 1965 को मोकामा के शंकरबाग टोले में किसान परिवार में जन्मे सूरजभान के पिता चाहते थे कि बेटा सेना में जाए। बड़े भाई भी CRPF में थे। लेकिन सूरजभान का मन फौज में नहीं लगा।
कम उम्र में ही उनका नाम स्थानीय अपराधों से जुड़ने लगा। धीरे-धीरे वे मोकामा के प्रभावशाली लोगों के संपर्क में आए और अपराध की दुनिया में उनकी पकड़ मजबूत होती चली गई।
मोकामा से गोरखपुर तक पहुंचा नाम
सूरजभान का नाम उत्तर प्रदेश के कुख्यात अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ला के साथ भी जोड़ा गया। पूर्व पुलिस अधिकारियों के हवाले से सामने आई कहानियों में AK-47 हथियारों और कई आपराधिक घटनाओं का जिक्र मिलता है।
1990 के दशक में मोकामा में उनकी टक्कर दूसरे बाहुबलियों से भी हुई। एक दौर में सूरजभान और अशोक सम्राट के बीच दुश्मनी की चर्चा रही। गोलीबारी की एक घटना में उनके बाल-बाल बचने की कहानी भी लंबे समय तक चर्चा में रही।
बृजबिहारी हत्याकांड ने बढ़ाई मुश्किलें
1998 में बिहार के तत्कालीन मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के बाद सूरजभान का नाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया। जांच के दौरान उनका नाम सामने आया और मामला अदालत तक पहुंचा।
इस केस में उन्हें निचली अदालत से सजा हुई, लेकिन बाद में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। इसी तरह कई अन्य आपराधिक मामलों में भी उन्हें लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।
जेल से निकली सियासत की राह
सूरजभान ने अपराध की दुनिया से राजनीति की ओर कदम बढ़ाया। वर्ष 2000 में उन्होंने जेल में रहते हुए मोकामा विधानसभा चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा और जीत दर्ज की।
चार साल बाद उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीता और संसद पहुंचे। इस तरह कभी बाहुबली के तौर पर पहचाने जाने वाले सूरजभान की पहचान सांसद के रूप में भी बनने लगी।
सजा के बाद चुनावी राजनीति पर लगा ब्रेक
रामी सिंह हत्याकांड में निचली अदालत से उम्रकैद की सजा के बाद उनकी चुनावी राजनीति पर कानूनी रोक लगी। हालांकि, इसके बावजूद उनका राजनीतिक प्रभाव खत्म नहीं हुआ। परिवार के सदस्य चुनावी राजनीति में सक्रिय रहे और सूरजभान का नाम बिहार की सियासत में बना रहा।
उनकी पत्नी वीणा देवी ने मुंगेर लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में जगह बनाई, जबकि उनके भाई चंदन सिंह भी नवादा से सांसद रहे।
सियासत बदली, लेकिन मोकामा से रिश्ता नहीं टूटा
समय के साथ बिहार की राजनीति बदली और सूरजभान के राजनीतिक समीकरण भी। अलग-अलग चुनावों में उनका परिवार अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ नजर आया।
2025 के विधानसभा चुनाव में उनकी पत्नी को मोकामा से चुनाव मैदान में उतारा गया, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस सीट पर अनंत सिंह ने जीत दर्ज की।
अब निगाहें चेन्नई पर
कभी मोकामा की सियासत में बाहुबल के लिए चर्चित रहे सूरजभान सिंह की तबीयत बिगड़ने की खबर ने उनके पुराने राजनीतिक और आपराधिक सफर को फिर चर्चा में ला दिया है।
फिलहाल राजनीति और पुराने किस्सों से दूर सूरजभान चेन्नई के अस्पताल में इलाज करा रहे हैं। समर्थकों और परिचितों की नजर अब उनके स्वास्थ्य से जुड़े अगले अपडेट पर है।
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