पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा मुद्दा चर्चा में है, जिसे सुनकर पहली नजर में मामला मामूली लग सकता है, लेकिन आरोपों ने इसे सियासी बहस का बड़ा मुद्दा बना दिया है। मामला है डस्टबिन की खरीद का। आरोप है कि जिस डस्टबिन की कीमत करीब ₹1,500 बताई जा रही है, स्वास्थ्य विभाग ने उसे कथित तौर पर ₹15,000 में खरीदा। यानी कीमत में करीब दस गुने के अंतर का दावा किया जा रहा है।
मामला वर्ष 2023 की खरीद से जुड़ा बताया जा रहा है। उस समय बिहार में एनडीए की सरकार थी। अब इस पुराने खरीद मामले को लेकर विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है और सोशल मीडिया पर दस्तावेजों व बिलों की तस्वीरों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
रोहिणी आचार्य ने बनाया सियासी हथियार
आरजेडी नेता रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इस कथित खरीद को लेकर तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर सवाल उठाए। उन्होंने महंगी डस्टबिन की खरीद को लेकर सरकार से जवाब मांगा और पूछा कि आखिर एक सामान्य कूड़ेदान की कीमत इतनी ज्यादा कैसे हो गई।
रोहिणी आचार्य ने इसे सरकारी खरीद में कथित गड़बड़ी का उदाहरण बताते हुए सवाल खड़ा किया कि जिस सामान की बाजार कीमत कम है, उसके लिए सरकारी खजाने से कई गुना ज्यादा रकम क्यों खर्च की गई।
सोशल मीडिया पर बिल और कीमत की चर्चा
डस्टबिन खरीद को लेकर सोशल मीडिया पर कुछ बिल और रसीदें वायरल होने का दावा किया जा रहा है। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर 2023 में स्वास्थ्य विभाग की खरीद कीमत और मौजूदा बाजार कीमत की तुलना की जा रही है।
हालांकि, वायरल दस्तावेज या किसी नेता के आरोप अपने आप में खरीद में अनियमितता साबित नहीं करते। पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सामने आने के लिए सरकारी रिकॉर्ड, टेंडर प्रक्रिया, सप्लाई ऑर्डर, बिल और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की जांच जरूरी होगी।
JDU ने विपक्ष से ही मांगा जवाब
विपक्ष के आरोपों के बाद सत्तारूढ़ जेडीयू ने भी पलटवार किया। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि मामला अगर सरकारी खरीद से जुड़ा है तो इसकी जांच सक्षम संस्थाओं और विधानसभा की प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि केवल किसी के बयान या सोशल मीडिया पर फोटो वायरल होने से मामला साबित नहीं होता। उन्होंने विधानसभा की लोक लेखा समिति का भी उल्लेख करते हुए कहा कि विपक्ष को पहले दस्तावेजों और पूरे मामले को वहां उठाना चाहिए।
अब सवाल डस्टबिन का नहीं, खरीद प्रक्रिया का
इस पूरे विवाद ने बिहार में सरकारी खरीद की प्रक्रिया को लेकर बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि अगर ₹1,500 के सामान की खरीद वास्तव में ₹15,000 में हुई है, तो कीमत तय करने का आधार क्या था, किस प्रक्रिया के तहत खरीद हुई और भुगतान किस दर पर किया गया?
दूसरी ओर, सरकार और सत्तापक्ष की ओर से यह संकेत दिया जा रहा है कि सोशल मीडिया पर वायरल दावों को अंतिम सच मानने के बजाय आधिकारिक जांच और दस्तावेजों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
यानी बिहार की राजनीति में फिलहाल डस्टबिन कूड़ा रखने के बजाय सवालों का ढेर जमा कर रहा है—और अब नजर इस बात पर है कि आरोपों के पीछे मौजूद खरीद रिकॉर्ड जांच के बाद क्या कहानी सामने लाते हैं।
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