नालंदा: कहते हैं हौसलों के आगे मुश्किलें भी हार जाती हैं। बिहार के नालंदा जिले के रहने वाले पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने अपनी मेहनत और जज्बे से इस कहावत को सच कर दिखाया है। आर्थिक तंगी, दिव्यांगता और सीमित संसाधनों के बावजूद झंडू ने ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए ब्रॉन्ज मेडल जीतकर इतिहास रच दिया।
28 वर्षीय झंडू कुमार ने पुरुष हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग वर्ग में 190 किलोग्राम वजन उठाकर 130.9 अंक हासिल किए और कांस्य पदक अपने नाम किया। इस मुकाबले में दुनिया के कई दिग्गज खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था, लेकिन झंडू ने अपने शानदार प्रदर्शन से सबका ध्यान खींच लिया।
झंडू ने प्रतियोगिता के पहले प्रयास में 181 किलोग्राम और दूसरे प्रयास में 190 किलोग्राम वजन उठाया। तीसरे प्रयास में उन्होंने 196 किलोग्राम वजन उठाकर रिकॉर्ड बनाने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। हालांकि उनका प्रदर्शन इतना शानदार रहा कि ब्रॉन्ज मेडल भारत की झोली में आ गया।
सब्जी बेचने वाले पिता का बेटा बना देश का गौरव
झंडू कुमार नालंदा के हरनौत प्रखंड के सबनौहडीह गांव के रहने वाले हैं। उनके पिता रामानंद पासवान और मां कमला देवी हरनौत बाजार में सड़क किनारे आलू-प्याज बेचकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं।
परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। झंडू पढ़ाई के साथ-साथ माता-पिता की दुकान में भी हाथ बंटाते थे। चार साल की उम्र में पोलियो की वजह से उनके शरीर का एक हिस्सा प्रभावित हो गया था, लेकिन उन्होंने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
परिवार आज भी किराए के कमरे में रहता है, लेकिन बेटे की उपलब्धि ने पूरे गांव को गर्व से भर दिया है।
PM मोदी ने दी बधाई, बताया प्रेरणादायक उपलब्धि
झंडू कुमार की जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें बधाई दी। उन्होंने कहा कि झंडू का प्रदर्शन उनकी ताकत, अनुशासन और वर्षों की मेहनत का उदाहरण है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर उन्होंने देश का नाम रोशन किया है।
बिना बड़ी सुविधाओं के तय किया अंतरराष्ट्रीय सफर
झंडू के इस सफर में उनके परिवार के अलावा कई लोगों का योगदान रहा। साल 2019 से कुंदन कुमार पांडे उनके मार्गदर्शक रहे। इसके बाद उन्हें स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र, गांधीनगर में प्रशिक्षण का मौका मिला।
वहां उन्हें पैरालंपिक पदक विजेता राजेंद्र सिंह रहेलू से भी प्रशिक्षण मिला, जिसने उनके खेल को नई ऊंचाई दी।
पिता बोले- बेटे ने संघर्ष को जीत में बदल दिया
झंडू के पिता रामानंद पासवान ने कहा कि बेटे की जीत उनके लिए जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी है। उन्होंने बताया कि परिवार ने कई मुश्किलें देखीं, लेकिन झंडू ने कभी हार नहीं मानी।
आज वही बेटा, जो कभी सब्जी की दुकान पर माता-पिता का हाथ बंटाता था, दुनिया के बड़े खेल मंच पर तिरंगा लहरा रहा है।
झंडू कुमार की कहानी सिर्फ एक मेडल जीतने की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और मेहनत के दम पर सपनों को पूरा करने की मिसाल बन गई है।
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