रांची: झारखंड की सियासत में उस वक्त हलचल मच गई, जब राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने अचानक अपनी पूरी सुरक्षा व्यवस्था और काफिले की गाड़ियां लौटा दीं। आमतौर पर जहां मंत्री और वीआईपी सुरक्षा घेरे में नजर आते हैं, वहीं किशोर अब बिना किसी सुरक्षाकर्मी के सड़कों पर घूमते दिखे—और यही बात अब चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है।
शुक्रवार की सुबह का नजारा अलग था। बिना गार्ड, बिना काफिला, मंत्री सीधे खेलगांव स्टेडियम पहुंचे, कार्यक्रम में शामिल हुए और फिर प्रोजेक्ट भवन सचिवालय के लिए निकल गए। यह दृश्य लोगों के लिए चौंकाने वाला था—क्योंकि यह सिर्फ एक दौरा नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ एक संदेश माना जा रहा है।
दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम की जड़ एक “अतिरिक्त गाड़ी” की मांग से जुड़ी है। मंत्री ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को पत्र लिखकर कहा था कि उनकी सुरक्षा में तैनात 16 जवानों को सिर्फ तीन गाड़ियों में समायोजित करना न तो व्यावहारिक है और न ही सुरक्षित। उन्होंने साफ लिखा था कि जवानों को ठूंसकर बैठाना सुरक्षा मानकों के खिलाफ है और इसके लिए एक अतिरिक्त वाहन जरूरी है।
लेकिन जब इस मांग पर कोई जवाब नहीं मिला, तो मामला यहीं नहीं रुका। उल्टा, वित्त विभाग की ओर से एक गाड़ी वापस करने का नोटिस जारी हो गया। यही वह बिंदु था, जहां से नाराजगी ने बड़ा रूप ले लिया।
अपने दूसरे पत्र में मंत्री ने साफ तौर पर लिखा कि यह स्थिति “शर्मिंदगी” की है। उन्होंने कहा कि एक तरफ सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत बताई जा रही है, दूसरी तरफ उसी में कटौती का आदेश दिया जा रहा है। अंततः उन्होंने फैसला लिया—“न गाड़ी चाहिए, न सुरक्षा”—और पूरी व्यवस्था ही लौटा दी।
अब इस फैसले के कई मायने निकाले जा रहे हैं। क्या यह सिर्फ प्रशासनिक नाराजगी है? या फिर सिस्टम की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल? सियासी गलियारों में इसे एक “साइलेंट प्रोटेस्ट” माना जा रहा है, जहां बिना बयान दिए ही मंत्री ने बहुत कुछ कह दिया।
फिलहाल, बिना सुरक्षा घूमते वित्त मंत्री की तस्वीरें और खबरें चर्चा में हैं—और सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह कदम व्यवस्था में बदलाव की शुरुआत है या सिर्फ एक सियासी संदेश?
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