लखीसराय: जिले में जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं से जुड़ी हालिया घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर बड़हिया नगर परिषद की सभापति डेजी देवी के पति और जदयू नेता सुजीत कुमार सार्वजनिक रूप से अपनी जान को खतरा बताते हुए नजर आए हैं, वहीं दूसरी ओर पिपरिया प्रखंड क्षेत्र में भाजपा नेता रामविलास शर्मा पर कथित गोलीबारी की घटना के बाद भी नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने की बात सामने आई है।
इन घटनाओं के बीच बड़ा सवाल यह है कि जब राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंता सामने आ रही है, तो पुलिस की कार्रवाई कितनी प्रभावी साबित हो रही है?
पिपरिया में हमले का आरोप, FIR के बाद भी गिरफ्तारी का इंतजार
रामविलास शर्मा की ओर से 14 अगस्त को पिपरिया थाने में दिए गए आवेदन के अनुसार, 13 अगस्त की रात करीब 8 बजे वह वलीपुर स्थित श्री जनता पुस्तकालय में अध्ययन कार्य की देखरेख कर रहे थे। इसी दौरान तीन नामजद लोगों पर हथियार के साथ पुस्तकालय परिसर में प्रवेश करने, गाली-गलौज करने और गोली चलाकर भागने का आरोप लगाया गया।
आवेदन में रामविलास शर्मा ने अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर आशंका जताते हुए प्राथमिकी दर्ज कर कार्रवाई की मांग की थी। उन्होंने पुलिस से घटनास्थल की जांच और उपलब्ध साक्ष्यों को सुरक्षित करने का भी अनुरोध किया था।
घटना के बाद पुलिस ने उनकी सुरक्षा के लिए दो बॉडीगार्ड उपलब्ध कराए हैं। हालांकि, उनके पक्ष की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि घटना के करीब एक महीने बाद भी नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी क्यों नहीं हो सकी है।
सुजीत कुमार का वीडियो भी चर्चा में
दूसरी ओर बड़हिया नगर परिषद की सभापति डेजी देवी के पति जदयू नेता सुजीत कुमार का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह अपनी जान को खतरा बताते हुए भावुक नजर आ रहे हैं। सुजीत कुमार को क्षेत्रीय सांसद एवं केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह के करीबी नेताओं में बताया जाता है।
इसी बीच अप्रैल 2026 में भागलपुर के सुल्तानगंज नगर परिषद कार्यालय में कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण कुमार की हत्या की घटना भी बिहार में नगर निकाय से जुड़े पदाधिकारियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चर्चा का कारण बनी थी। 28 अप्रैल को कार्यालय में हुई गोलीबारी में कृष्ण भूषण कुमार की मौत हो गई थी। बाद में इस मामले में पुलिस कार्रवाई भी हुई।
सवाल सिर्फ दो घटनाओं का नहीं
लखीसराय में सामने आए इन मामलों के बाद राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर चर्चा तेज है। खासकर पिपरिया की घटना में नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी का इंतजार पुलिस की कार्रवाई पर सवाल खड़े कर रहा है।
हालांकि, किसी जिले की पूरी कानून-व्यवस्था पर निष्कर्ष निकालने के लिए व्यापक अपराध आंकड़ों और पुलिस की कार्रवाई के आधिकारिक रिकॉर्ड को देखना जरूरी होगा। फिलहाल उपलब्ध घटनाक्रम इतना जरूर बताता है कि लखीसराय में सुरक्षा और त्वरित पुलिस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच चिंता का माहौल है।
अब देखना यह है कि पिपरिया मामले में पुलिस आगे क्या कार्रवाई करती है और सुरक्षा को लेकर सामने आ रही चिंताओं पर प्रशासन की ओर से क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।
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