गया: पितृपक्ष मेला शुरू होने से पहले गया में पिंडदान को लेकर परंपरा और डिजिटल सुविधा आमने-सामने दिख रही है। बिहार पर्यटन विभाग ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पिंडदान के पांच पर्यटन पैकेज के साथ ₹23 हजार का ऑनलाइन ई-पिंडदान पैकेज भी उपलब्ध कराया है। वहीं, विष्णुपद मंदिर प्रबंधन समिति और पंडा समाज ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई है।
पंडा समाज का कहना है कि पिंडदान केवल एक ऑनलाइन सेवा नहीं, बल्कि पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान है, जिसे श्रद्धालु स्वयं गया आकर पुरोहितों के मार्गदर्शन में करते रहे हैं। समिति से जुड़े लोगों ने दावा किया कि धार्मिक ग्रंथों में ऑनलाइन पिंडदान की व्यवस्था का उल्लेख नहीं मिलता। ये उनके धार्मिक मत और परंपरा से जुड़े दावे हैं।
सरकार का पैकेज, परंपरा का सवाल
पर्यटन विभाग की ओर से जारी पैकेज में परिवहन, आवास, भोजन, पूजन सामग्री और पंडा-पुजारी की सेवाओं को शामिल किया गया है। अलग-अलग पैकेज की कीमतें ₹11,250 से ₹40,700 तक हैं। इसके अलावा गयाजी नहीं पहुंच पाने वाले श्रद्धालुओं के लिए ई-पिंडदान की सुविधा ₹23,000 में उपलब्ध कराई गई है।
ई-पिंडदान पैकेज में विष्णुपद मंदिर, अक्षयवट और फल्गु नदी पर अनुष्ठान, पुरोहित की सेवाएं, पूजन सामग्री व दक्षिणा तथा पूरे अनुष्ठान की वीडियो रिकॉर्डिंग शामिल होने की जानकारी दी गई है।
पंडा समाज की आपत्ति क्या है?
विष्णुपद मंदिर प्रबंधन समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि गया आने और अपने पितरों के लिए स्वयं पिंडदान करने की परंपरा का धार्मिक महत्व है। उनका विरोध केवल ऑनलाइन माध्यम को लेकर नहीं, बल्कि इस बात को लेकर भी है कि डिजिटल व्यवस्था पारंपरिक पंडा-पुरोहित व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। 2025 में भी गया के पंडा समाज ने ई-पिंडदान योजना पर इसी तरह आपत्ति जताई थी।
दूसरी ओर, पर्यटन विभाग की व्यवस्था का उद्देश्य उन श्रद्धालुओं को सुविधा देना बताया गया है, जो किसी कारणवश गया नहीं पहुंच सकते। 2026 के पितृपक्ष मेले के लिए सरकार ने यात्रा, ठहरने और धार्मिक अनुष्ठानों को जोड़कर कई पैकेज तैयार किए हैं।
25 सितंबर से शुरू होगा पितृपक्ष मेला
गयाजी में पितृपक्ष मेला 25 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 तक आयोजित होना है। मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है और प्रशासन की ओर से आवास, परिवहन तथा अन्य सुविधाओं की भी तैयारी की जा रही है।
अब सवाल यही है—क्या डिजिटल सुविधा के जरिए धार्मिक अनुष्ठान को घर तक पहुंचाना समय की जरूरत है, या पिंडदान की पारंपरिक व्यवस्था को ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए? गया में इसी सवाल पर बहस तेज हो गई है।
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