पटना: धान अधिप्राप्ति में सामने आई गड़बड़ियों ने जिले की प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। बिहार सरकार ने जिला पदाधिकारी मिथिलेश मिश्र के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने का फैसला लेकर साफ संकेत दे दिया है कि अब अफसरशाही की मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
सहकारिता विभाग की जांच रिपोर्ट ने जो तस्वीर पेश की है, वह चौंकाने वाली है। वर्ष 2025-26 के लिए तय लक्ष्य के अलावा 8,000 एमटी अतिरिक्त धान आवंटन में कथित तौर पर नियमों को दरकिनार किया गया। आरोप है कि न तो कोई स्पष्ट मानक अपनाया गया और न ही पारदर्शिता बरती गई।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह सिर्फ प्रशासनिक चूक है या फिर सिस्टम के भीतर कोई गहरा खेल? रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कई समितियों को जरूरत से ज्यादा लक्ष्य दे दिया गया, जबकि कई को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। इससे निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
भंडारण क्षमता, पिछला प्रदर्शन और कार्यक्षमता जैसे बुनियादी मानकों को नजरअंदाज करना प्रशासनिक लापरवाही का संकेत माना जा रहा है। और जब जिला पदाधिकारी का स्पष्टीकरण भी जांच के तथ्यों से मेल नहीं खाता, तो मामला और गंभीर हो जाता है।
सरकार ने इसे कर्तव्य में लापरवाही और पद के दुरुपयोग की श्रेणी में मानते हुए अखिल भारतीय सेवाएं नियमावली के तहत कार्रवाई शुरू कर दी है। यानी अब यह मामला सिर्फ कागजी नहीं, बल्कि करियर पर असर डालने वाला बन चुका है।
यह घटनाक्रम एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है—क्या किसानों के नाम पर चलने वाली योजनाओं में कहीं अफसरशाही की मनमानी हावी हो रही है?
सरकार की कार्रवाई यह जरूर दिखाती है कि अब जवाबदेही तय होगी, लेकिन असली जवाब अभी बाकी है—आखिर इस पूरे खेल की जिम्मेदारी कौन लेगा?
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