जहानाबाद: जिले के सिविल सर्जन कार्यालय में दवा एवं चिकित्सा सामग्रियों की खरीद को लेकर 5 करोड़ 54 लाख 45 हजार 282 रुपये के भुगतान पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। आरोप है कि वित्तीय वर्ष 2026-27 के दौरान सरकारी नियमों और निर्धारित निविदा प्रक्रिया का पालन किए बिना एक चिह्नित आपूर्तिकर्ता को करोड़ों रुपये का भुगतान कर दिया गया। शिकायत में 50 प्रतिशत तक कमीशनखोरी का भी आरोप लगाया गया है। मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और खरीद प्रक्रिया को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
इस पूरे मामले में हुलासगंज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के सेवामुक्त डाटा ऑपरेटर कुंदन कुमार ने शिकायत दर्ज कराते हुए दवा और अन्य चिकित्सा सामग्रियों की खरीद में वित्तीय अनियमितता का आरोप लगाया है। शिकायतकर्ता का दावा है कि खरीद प्रक्रिया के दौरान सरकारी दिशा-निर्देशों की अनदेखी की गई और GeM यानी गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस पोर्टल के माध्यम से खरीद की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
GeM प्रक्रिया और NOC को लेकर उठाए सवाल
शिकायत के मुताबिक, दवा एवं चिकित्सा सामग्रियों की खरीद के लिए निर्धारित प्रक्रिया अपनाने के बजाय कथित तौर पर एक खास आपूर्तिकर्ता को प्राथमिकता दी गई। आरोप यह भी है कि बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन लिमिटेड (BMSICL), पटना से अनापत्ति प्रमाणपत्र यानी NOC प्राप्त किए बिना ही संबंधित राशि का भुगतान कर दिया गया।
शिकायतकर्ता ने 5 करोड़ 54 लाख 45 हजार 282 रुपये के भुगतान को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि यदि खरीद प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया गया, तो यह सरकारी वित्तीय व्यवस्था और पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर मामला है। शिकायत में 50 प्रतिशत कमीशनखोरी की बात भी कही गई है, हालांकि इस आरोप की अभी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
सिविल सर्जन समेत चार कर्मियों की भूमिका पर सवाल
इस शिकायत में सिविल सर्जन डॉ. हरीशचंद्र चौधरी के अलावा प्रधान लिपिक दिलीप कुमार, प्रभारी लिपिक माधुरी कुमारी और जिला भंडारपाल मतेन्द्र गांधी की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच कराने की मांग की है।
हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोप अभी जांच के दायरे में हैं। किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता अथवा वित्तीय अनियमितता की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
सिविल सर्जन ने आरोपों को किया खारिज
दूसरी ओर, सिविल सर्जन डॉ. हरीशचंद्र चौधरी ने अपने ऊपर लगाए गए वित्तीय अनियमितता के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि पूर्व डाटा ऑपरेटर कुंदन कुमार को सेवा से हटाया गया था और इसी वजह से वह दुर्भावना से ग्रसित होकर इस तरह की बातें फैला रहे हैं।
सिविल सर्जन के मुताबिक, विभाग की ओर से इस मामले में उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया था। उन्होंने अपना जवाब तैयार कर मुख्यालय को भेज दिया है। उनका पक्ष है कि शिकायतकर्ता की ओर से लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं।
डीएम ने कहा- विभागीय स्तर पर कराई जा रही जांच
मामले को लेकर जिलाधिकारी छिरिंग वाई भूटिया ने भी संज्ञान लिया है। डीएम ने स्पष्ट किया है कि पूरे प्रकरण की विभागीय स्तर पर जांच कराई जा रही है। जांच में यदि सरकारी राशि के गबन, वित्तीय नियमों के उल्लंघन अथवा किसी अन्य अनियमितता की पुष्टि होती है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कड़ी वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
जिलाधिकारी के इस बयान के बाद अब मामले में जांच रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। जांच के दौरान यह स्पष्ट होना है कि दवा और चिकित्सा सामग्रियों की खरीद में निर्धारित नियमों का पालन किया गया था या नहीं। साथ ही भुगतान की प्रक्रिया, आपूर्तिकर्ता के चयन और NOC से जुड़े आरोपों की भी पड़ताल अहम होगी।
जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें, कई सवालों के जवाब का इंतजार
फिलहाल जहानाबाद सिविल सर्जन कार्यालय में दवा खरीद के नाम पर हुए 5 करोड़ 54 लाख 45 हजार 282 रुपये के भुगतान को लेकर उठे सवालों का जवाब जांच रिपोर्ट से ही मिल सकेगा। सबसे अहम सवाल यह है कि क्या खरीद प्रक्रिया में GeM पोर्टल और BMSICL से NOC लेने संबंधी नियमों का पालन किया गया था? क्या भुगतान के लिए सभी जरूरी औपचारिकताएं पूरी की गई थीं? और शिकायत में लगाए गए कमीशनखोरी के आरोपों में कितनी सच्चाई है?
एक तरफ शिकायतकर्ता ने खरीद प्रक्रिया में गंभीर अनियमितता और कमीशनखोरी का आरोप लगाया है, वहीं सिविल सर्जन ने इन आरोपों को दुर्भावना से प्रेरित बताते हुए खारिज किया है। ऐसे में निष्पक्ष जांच और उसके निष्कर्ष बेहद महत्वपूर्ण होंगे। अब देखना होगा कि जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और क्या इस मामले में किसी अधिकारी या कर्मचारी की जवाबदेही तय होती है।
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