वॉशिंगटन: अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। चुनावी नतीजों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों—हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट—में बहुमत हासिल कर लिया है। इस नतीजे के बाद ट्रम्प प्रशासन के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। अब सरकार के बजट, कानून निर्माण, नियुक्तियों और प्रशासनिक फैसलों पर विपक्ष की मजबूत निगरानी रहेगी।
3 नवंबर को हुए मतदान के बाद 4 नवंबर को सामने आए नतीजों ने अमेरिकी राजनीति का समीकरण बदल दिया है। चुनाव में महंगाई, रोजमर्रा की जिंदगी का बढ़ता खर्च, ईरान के साथ सैन्य संघर्ष और ट्रम्प प्रशासन की नीतियां प्रमुख मुद्दे रहे। चुनावी विश्लेषणों में इन मुद्दों को रिपब्लिकन पार्टी के खिलाफ मतदाताओं की नाराजगी की बड़ी वजह माना जा रहा है।
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में डेमोक्रेट्स को बहुमत
अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में कुल 435 सीटें हैं। यहां हर दो साल में सभी सीटों पर चुनाव होता है। 4 नवंबर को उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 367 सीटों के नतीजे सामने आए थे। इनमें डेमोक्रेटिक पार्टी को 228 और रिपब्लिकन पार्टी को 139 सीटें मिली थीं। बाकी 68 सीटों पर मतगणना जारी थी।
इस तरह डेमोक्रेट्स बहुमत के जरूरी आंकड़े को पार कर चुके थे। चुनाव से पहले इस सदन में रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत था, लेकिन अब सदन की कमान विपक्ष के हाथ में चली गई है।
सीनेट में भी रिपब्लिकन पार्टी को झटका
अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट में भी सत्ता का समीकरण बदल गया है। सीनेट में कुल 100 सदस्य होते हैं और प्रत्येक राज्य से दो सीनेटर चुने जाते हैं। इस बार 35 सीटों पर चुनाव हुआ।
उपलब्ध नतीजों के मुताबिक, डेमोक्रेटिक पार्टी और उसके साथ मतदान करने वाले निर्दलीय सदस्यों की संख्या 54 तक पहुंच गई, जबकि रिपब्लिकन पार्टी के पास 44 सीटें रहीं। दो सीटों के नतीजे बाकी थे। इस जीत के बाद डेमोक्रेट्स को दोनों सदनों में बहुमत मिल गया है।
महंगाई बनी ट्रम्प के खिलाफ बड़ी चुनौती
चुनाव में अमेरिकी जनता की नाराजगी की सबसे बड़ी वजहों में महंगाई और रोजमर्रा के खर्च में बढ़ोतरी शामिल रही। अमेरिका में स्वास्थ्य सेवाओं, पेट्रोल, खाद्य सामग्री, मकान के किराये और दूसरी जरूरी चीजों की कीमतों को लेकर लोगों की चिंता बढ़ी है।
ट्रम्प प्रशासन की टैरिफ नीति भी विवादों में रही। आयातित सामान पर शुल्क बढ़ने से कारोबारियों की लागत और उपभोक्ताओं की कीमतों पर असर पड़ने की आशंका जताई गई। विपक्ष ने इसे आम अमेरिकी परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ाने वाली नीति बताया।
ईरान युद्ध ने भी बढ़ाई राजनीतिक मुश्किलें
ट्रम्प प्रशासन की ईरान नीति और सैन्य कार्रवाई भी चुनाव के दौरान चर्चा का बड़ा विषय रही। अमेरिका के भीतर युद्ध को लेकर असहमति सामने आई। विरोधियों का कहना था कि अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत और कूटनीति से निकालने की कोशिश होनी चाहिए।
ईरान संघर्ष का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और सप्लाई चेन पर भी पड़ने की आशंका है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत प्रभावित हो सकती है। ऐसे में युद्ध और महंगाई का मुद्दा अमेरिकी मतदाताओं के बीच ट्रम्प प्रशासन के लिए चुनौती बना।
ट्रम्प की राष्ट्रपति की कुर्सी पर तत्काल खतरा नहीं
मिडटर्म चुनाव में हार का मतलब यह नहीं है कि ट्रम्प को राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ेगा। अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है और संसद में बहुमत खोने से राष्ट्रपति का पद अपने आप समाप्त नहीं होता।
ट्रम्प अपने कार्यकाल के दौरान कार्यकारी आदेश जारी करने, विदेश नीति से जुड़े फैसले लेने और विधेयकों पर वीटो लगाने जैसी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि, अब संसद में बहुमत डेमोक्रेट्स के पास होने के कारण उनके लिए कानून और बजट पारित कराना पहले की तुलना में कठिन हो सकता है।
अब ट्रम्प प्रशासन की बढ़ेगी संसदीय निगरानी
हाउस की विभिन्न समितियों का नेतृत्व अब डेमोक्रेटिक पार्टी के पास होगा। ये समितियां सरकारी विभागों, अधिकारियों और प्रशासनिक फैसलों की जांच कर सकती हैं। जरूरत पड़ने पर दस्तावेज और गवाही भी मांग सकती हैं।
इसके अलावा बजट और सरकारी खर्च को लेकर भी ट्रम्प प्रशासन और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ सकता है। सीनेट में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने से न्यायिक और अन्य प्रमुख नियुक्तियों की मंजूरी में भी सरकार को चुनौती मिल सकती है।
महाभियोग की चर्चा, लेकिन पद से हटाना आसान नहीं
डेमोक्रेट्स के पास हाउस में बहुमत होने के कारण ट्रम्प के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की राजनीतिक संभावना बनी हुई है। हालांकि, महाभियोग का प्रस्ताव पारित होना और राष्ट्रपति को पद से हटाना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
हाउस में महाभियोग के बाद मामला सीनेट में जाता है। राष्ट्रपति को दोषी ठहराकर पद से हटाने के लिए सीनेट में उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है। ट्रम्प पहले भी 2019 और 2021 में महाभियोग की प्रक्रिया का सामना कर चुके हैं, लेकिन सीनेट में दोषी नहीं ठहराए गए थे।
भारत और दुनिया पर भी पड़ सकता है असर
अमेरिकी चुनाव के नतीजों का असर भारत सहित दुनिया के दूसरे देशों के साथ अमेरिका के संबंधों पर भी पड़ सकता है। ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों में व्यापार शुल्क, रूस से तेल खरीद, वीजा नियम और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं।
संसद में डेमोक्रेट्स की मजबूती से भारत के साथ संबंधों पर अमेरिकी कांग्रेस में बहस और निगरानी बढ़ सकती है। हालांकि, इससे ट्रम्प की विदेश नीति तत्काल बदल जाएगी, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। विदेश नीति और सैन्य कार्रवाई से जुड़े कई फैसलों में राष्ट्रपति की भूमिका बनी रहती है।
भारत के लिए ईरान युद्ध का आर्थिक असर भी महत्वपूर्ण है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर देश के आयात बिल, परिवहन और महंगाई पर पड़ सकता है।
आने वाले दो साल ट्रम्प के लिए होंगे चुनौतीपूर्ण
मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेट्स की जीत ने ट्रम्प प्रशासन के सामने राजनीतिक चुनौतियां बढ़ा दी हैं। राष्ट्रपति पद पर ट्रम्प बने रहेंगे, लेकिन संसद में विपक्ष का बहुमत उनके कई फैसलों की राह मुश्किल बना सकता है।
अब देखना होगा कि ट्रम्प प्रशासन विपक्ष के साथ किस तरह तालमेल बैठाता है और महंगाई, ईरान युद्ध, व्यापार नीति तथा सरकारी खर्च जैसे मुद्दों पर क्या रुख अपनाता है। अमेरिकी राजनीति में बदले इस समीकरण का असर आने वाले समय में केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और कूटनीति पर भी देखने को मिल सकता है।
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