रांची: झारखंड में आयोजित 26000 शिक्षकों की बहाली प्रक्रिया एक तरफ जहां हजारों युवाओं के चेहरे पर खुशी लेकर आई, वहीं इसी भीड़ में कुछ ऐसे चेहरे भी सामने आए, जिनकी कहानी सुनकर हर कोई हैरान रह गया।
टाना भगत इंडोर स्टेडियम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हाथों जब 1000 से अधिक शिक्षकों को नियुक्ति पत्र बांटे जा रहे थे, तब मंच पर तालियों की गूंज थी… लेकिन भीड़ के बीच कुछ ऐसे लोग भी थे जिनकी आंखों में खुशी नहीं, बल्कि एक अजीब-सी बेचैनी साफ झलक रही थी।
खुशी नहीं, दर्द लेकर पहुंचे कुछ शिक्षक
नियुक्ति पत्र हाथ में तो था, लेकिन कुछ शिक्षकों के लिए यह सिर्फ एक औपचारिक कागज बनकर रह गया। वजह सुनकर प्रशासन भी कुछ पल के लिए चुप रह गया।
किसी की सेवा अवधि खत्म होने के बिल्कुल करीब थी…
तो कोई ऐसा भी था जिसकी रिटायरमेंट सिर्फ कुछ घंटे बाद ही तय थी।
“नौकरी मिली, लेकिन शुरू होने से पहले खत्म”
पलामू के एक शिक्षक नियूम अंसारी की कहानी सबसे ज्यादा चर्चा में है। उन्हें नियुक्ति पत्र तो मिला, लेकिन उनकी सेवा अवधि एक महीने पहले ही पूरी हो चुकी थी।
मतलब… नौकरी का सपना पूरा होने से पहले ही सिस्टम की टाइमिंग ने उसे खत्म कर दिया।
इसी तरह जामताड़ा के नंदलाल रवानी ने भी नियुक्ति पत्र तो लिया, लेकिन अगले ही दिन उनके रिटायरमेंट की तारीख आ गई।
सवालों में घिरा सिस्टम
इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या वर्षों की देरी का खामियाजा ऐसे ही लोगों को भुगतना पड़ेगा?
या फिर यह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक थी जिसने किसी की जिंदगी का सबसे बड़ा मौका एक पल में छीन लिया?
“कागज मिला, लेकिन नौकरी नहीं मिली”
नियुक्ति पत्र मिलने की खुशी के बीच जब कुछ चेहरों पर उदासी दिखी, तो पूरा कार्यक्रम एक अलग ही कहानी बयान कर रहा था—जहां नौकरी का सपना पूरा नहीं हुआ, लेकिन सरकारी प्रक्रिया ने उसे सिर्फ एक “औपचारिकता” बना दिया।
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