नालंदा: जेल का दरवाजा खुला, एक बंदी बाहर निकल गया और कागजों में रिहाई किसी दूसरे कैदी की दर्ज हो गई! नालंदा की बिहारशरीफ मंडल कारा से सामने आई यह घटना किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगती। फर्क सिर्फ इतना है कि यह कोई फिल्मी पटकथा नहीं, बल्कि जेल में रिहाई की प्रक्रिया के दौरान हुई कथित गंभीर चूक का मामला है।
हैरानी की बात यह है कि जिस कैदी को जमानत मिली थी, वह जेल में ही बंद रहा, जबकि दूसरे मामले में बंद उसका हमनाम कैदी बाहर निकल गया। बताया जाता है कि दोनों के नाम और पिता के नाम को लेकर भ्रम पैदा हुआ। 24 सितंबर को हुई इस गड़बड़ी का पता जेल प्रशासन को 1 अक्टूबर को चला। इसके बाद वास्तविक जमानत प्राप्त कैदी को रिहा किया गया और गलत तरीके से बाहर निकला बंदी भी अदालत पहुंचकर आत्मसमर्पण कर गया।
जमानत एक की, आजादी दूसरे को कैसे मिली?
बिहारशरीफ मंडल कारा में सतीश चौहान उर्फ सतीश बिंद और चंद्रदीप चौहान उर्फ चंद्रदीप बिंद अलग-अलग मामलों में बंद थे। जानकारी के अनुसार, सतीश के पिता का नाम भी चंद्रदीप था। आरोप है कि इसी नाम के भ्रम में रिहाई की कागजी प्रक्रिया के दौरान गड़बड़ी हो गई।
जिस सतीश को जमानत मिलने के बाद रिहा किया जाना था, वह जेल में ही रह गया। दूसरी ओर, चंद्रदीप जेल से बाहर निकल गया। यानी रिकॉर्ड में रिहाई किसी और की और जेल के गेट से बाहर दूसरा व्यक्ति!
सात दिन तक किसी को क्यों नहीं लगी भनक?
इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि कथित गड़बड़ी का खुलासा तुरंत नहीं हुआ। करीब सात दिन बाद, 1 अक्टूबर को रिपोर्ट तैयार करने के दौरान रिकॉर्ड का मिलान किया गया, तब पता चला कि जमानत पाने वाला कैदी अभी जेल में है और दूसरा बंदी बाहर जा चुका है।
इसके बाद जेल प्रशासन में हलचल मच गई। 2 अक्टूबर को सतीश चौहान को नियमानुसार रिहा किया गया। वहीं, गलत तरीके से बाहर निकला चंद्रदीप उसी दिन दोपहर करीब तीन बजे बिहारशरीफ कोर्ट पहुंचा और आत्मसमर्पण कर दिया।
एक केस में बेल, दूसरे केस का क्या हुआ?
मामले में यह भी बताया गया है कि चंद्रदीप चौहान उर्फ बौना के खिलाफ दो अलग-अलग मामले दर्ज थे। उसे एक मामले में जमानत मिली थी, जबकि दूसरे मामले में जमानत की प्रक्रिया लंबित थी। इसके बावजूद उसका जेल से बाहर निकल जाना रिहाई के समय सभी मामलों की स्थिति जांचने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।
हालांकि, संबंधित केस रिकॉर्ड और आधिकारिक जांच से ही यह स्पष्ट होगा कि रिहाई के समय किन दस्तावेजों का सत्यापन किया गया था और गलती किस स्तर पर हुई।
तीन वार्डन सस्पेंड, अब जवाबदेही पर सवाल
घटना सामने आने के बाद जेल अधीक्षक ने संबंधित कर्मियों से स्पष्टीकरण मांगा और रिपोर्ट कारा मुख्यालय, पटना भेजी। इसके बाद कारा आईजी ने ड्यूटी में लापरवाही के आरोप में तीन वार्डन को निलंबित कर दिया। एक स्थानीय कांग्रेस नेता ने भी मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर गलत तरीके से रिहा हुआ कैदी खुद अदालत में आत्मसमर्पण करने नहीं पहुंचता, तो जेल प्रशासन को इस चूक का पता कब चलता? क्या केवल नाम और पिता के नाम के आधार पर पहचान में भ्रम हो सकता है, या रिहाई से पहले दस्तावेजों के मिलान में भी गंभीर कमी रही?
इस घटना ने जेल की रिहाई व्यवस्था और रिकॉर्ड सत्यापन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि गलती कैसे हुई, उसकी जिम्मेदारी किन लोगों पर तय होती है और भविष्य में ऐसी चूक रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।
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