नालंदा जिला में महिला के साथ हुई अमानवीय घटना ने एक बार फिर कानून-व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। 26 मार्च को हुई इस घटना के बाद पुलिस भले ही एक्शन मोड में नजर आ रही है, लेकिन यह सवाल भी उतना ही अहम है कि आखिर ऐसी घटनाएं होती ही क्यों हैं?
नूरसराय थाना क्षेत्र के एक गांव में हुई इस बर्बरता का वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तब जाकर प्रशासन की नींद टूटी। पुलिस ने तेजी दिखाते हुए अब तक रंजन कुमार, सचिन कुमार, दशरथ चौधरी, शैलेश कुमार, डोमन पासवान और सोनू कुमार समेत कुल आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। छापेमारी अभी भी जारी है।
पुलिस अधीक्षक भारत सोनी का कहना है कि विशेष टीम बनाकर लगातार कार्रवाई की जा रही है और किसी भी आरोपी को बख्शा नहीं जाएगा। वीडियो में कुछ महिलाएं भी घटना को उकसाती नजर आई हैं, जिन्हें चिन्हित कर उनके खिलाफ भी कार्रवाई की तैयारी चल रही है।
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल पुलिस की कार्रवाई नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर है जहां अपराध पहले होता है और कार्रवाई बाद में। अगर वीडियो वायरल नहीं होता, तो क्या यह मामला भी दबा दिया जाता? यह सवाल अब आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बन चुका है।
और बात सिर्फ प्रशासन की ही नहीं है, समाज भी कठघरे में खड़ा है। जिस घटना में कुछ महिलाएं ही उकसाने की भूमिका में दिख रही हैं, वह यह दर्शाता है कि समस्या सिर्फ अपराधियों तक सीमित नहीं, बल्कि सोच और मानसिकता में गहराई तक बैठ चुकी है।
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल करने और पीड़िता की पहचान उजागर करने वालों पर भी कार्रवाई की बात कही जा रही है। साइबर सेल को सक्रिय कर दिया गया है। लेकिन यह भी सच है कि समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसे संवेदनशील मामलों में भी संवेदनहीन बना हुआ है।
सरकार हर बार कड़े कानून और सख्त कार्रवाई की बात करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अपराध के बाद ही सिस्टम जागता है। सवाल यह है कि क्या सिर्फ गिरफ्तारी से समस्या खत्म हो जाएगी, या फिर जरूरत है उस सोच को बदलने की, जहां इंसानियत सबसे पीछे छूटती जा रही है।
इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कानून का डर कब पैदा होगा और समाज अपनी जिम्मेदारी कब समझेगा।
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नालंदा से विरेंम्द्र कुमार की रिपोर्ट…