पटना: बिहार में मानसून की विदाई के साथ ही मौसम धीरे-धीरे बदलने लगा है। सुबह और शाम के तापमान में बदलाव महसूस होने लगा है और लोगों को आने वाले सर्दी के मौसम का इंतजार है। लेकिन इस बार सर्दियों को लेकर मौसम वैज्ञानिकों की नजर प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रहे अल नीनो पर टिकी है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA के ताजा आकलन के अनुसार, वर्ष 2026 के अंत तक यह मौसमी घटना बेहद मजबूत स्तर पर पहुंच सकती है। इसका असर दुनिया के कई हिस्सों में तापमान, बारिश और मौसम के सामान्य पैटर्न पर पड़ने की आशंका है।
मौसम से जुड़े इस संभावित बदलाव का असर भारत पर भी पड़ सकता है। बिहार जैसे मैदानी राज्य में लोगों के मन में सवाल है कि क्या इस बार दिसंबर और जनवरी में कड़ाके की ठंड कम पड़ेगी? क्या शीतलहर के दिनों की संख्या घट सकती है? और क्या सामान्य से अधिक तापमान गेहूं, सरसों, चना और मटर जैसी रबी फसलों के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है?
मजबूत अल नीनो के कारण सर्दियों के मौसम में बदलाव की आशंका जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बिहार में इस बार ठंड नहीं पड़ेगी। किसी खास जिले में न्यूनतम तापमान कितना रहेगा, कितने दिन शीतलहर चलेगी और कब ठंड का प्रकोप बढ़ेगा, इसका आकलन स्थानीय मौसम परिस्थितियों और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्वानुमानों के आधार पर ही किया जा सकता है।
क्या है सुपर अल नीनो, जिसे लेकर दुनिया भर में चिंता?
अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। समुद्र के तापमान में यह बदलाव वायुमंडलीय हवाओं, बारिश और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के मौसम को प्रभावित कर सकता है।
सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में चलने वाली हवाएं गर्म सतही पानी को पश्चिम की ओर धकेलती हैं। इससे एशिया और इंडोनेशिया के आसपास के क्षेत्रों में गर्म पानी जमा होता है, जबकि दक्षिण अमेरिका के निकट पूर्वी प्रशांत महासागर में अपेक्षाकृत ठंडा पानी ऊपर आ सकता है।
लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ती हैं और समुद्र की सतह का तापमान मध्य तथा पूर्वी प्रशांत में बढ़ने लगता है, तो अल नीनो की स्थिति विकसित होती है। इसके कारण वायुमंडल और समुद्र के बीच चलने वाली सामान्य प्रक्रियाओं में बदलाव आता है। इसका प्रभाव कहीं कम बारिश, कहीं अत्यधिक गर्मी और कहीं असामान्य वर्षा के रूप में सामने आ सकता है।
जब अल नीनो बहुत मजबूत हो जाता है, तो उसे आम तौर पर ‘सुपर अल नीनो’ कहा जाता है। हालांकि, यह नाम अपने आप में किसी एक निश्चित स्थानीय मौसम परिणाम की गारंटी नहीं देता। इसका अर्थ है कि प्रशांत महासागर में तापमान का असामान्य अंतर बहुत अधिक मजबूत हो सकता है।
1950 के बाद के सबसे मजबूत अल नीनो की आशंका क्यों?
अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर की 8 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रशांत महासागर में अल नीनो लगातार मजबूत हो रहा है। एजेंसी ने जनवरी से मार्च 2027 तक मजबूत से बेहद मजबूत अल नीनो बने रहने की संभावना 83 प्रतिशत से अधिक बताई है। रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर के दौरान पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत के कुछ हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 4 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक रहा।
WMO के 8 अक्टूबर के अपडेट में भी बताया गया है कि अक्टूबर से दिसंबर 2026 के बीच प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। इस अवधि के बाद दिसंबर के आसपास अल नीनो के चरम पर पहुंचने का अनुमान है।
इसी वजह से मौसम वैज्ञानिक इस घटना पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। यदि पूर्वानुमान के अनुरूप समुद्र का तापमान बढ़ता है, तो इसका प्रभाव वर्ष 2027 तक दुनिया के विभिन्न हिस्सों के मौसम पर बना रह सकता है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि अल नीनो की मजबूती का अनुमान और बिहार में सर्दी का सटीक पूर्वानुमान दो अलग-अलग बातें हैं। समुद्र के तापमान में बदलाव वैश्विक मौसम की दिशा को प्रभावित करता है, लेकिन किसी खास राज्य में ठंड कितनी पड़ेगी, यह अन्य मौसमी परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।
बिहार में क्या इस बार कम पड़ेगी कड़ाके की ठंड?
बिहार में सर्दियों के दौरान दिसंबर और जनवरी को आम तौर पर ठंड का प्रमुख समय माना जाता है। इस दौरान पटना, गया, नालंदा, शेखपुरा, लखीसराय, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, पूर्णिया और अन्य जिलों में तापमान में गिरावट दर्ज हो सकती है। उत्तर-पश्चिमी दिशा से आने वाली ठंडी हवाएं, स्थानीय हवा की गति, बादलों की स्थिति और कोहरे जैसे कारक भी ठंड की तीव्रता को प्रभावित करते हैं।
इस बार मजबूत अल नीनो के कारण वैश्विक स्तर पर सामान्य से अधिक तापमान की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में बिहार में भी सर्दियों के औसत तापमान पर प्रभाव पड़ने की संभावना पर नजर रखी जा रही है।
यदि मौसम की अन्य परिस्थितियां भी अनुकूल रहीं, तो सर्दियों के कुछ हिस्सों में तापमान सामान्य से ऊपर रह सकता है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि बिहार में शीतलहर नहीं चलेगी या कड़ाके की ठंड बिल्कुल नहीं पड़ेगी।
कई बार सामान्य से गर्म सर्दियों के मौसम में भी कुछ दिनों के लिए तापमान अचानक गिर सकता है। ठंडी हवाओं के सक्रिय होने या अन्य मौसमी प्रणालियों के कारण कुछ जिलों में शीतलहर की स्थिति बन सकती है। इसलिए लोगों को पूरे मौसम के लिए एक ही तरह के अनुमान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
नवंबर से फरवरी तक कैसा रहता है बिहार का सर्दी का मौसम?
बिहार में ठंड का असर आमतौर पर नवंबर के दौरान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। दिसंबर और जनवरी में कई इलाकों में न्यूनतम तापमान नीचे जा सकता है, जबकि फरवरी में दिन का तापमान बढ़ने लगता है। हालांकि, हर साल ठंड शुरू होने और खत्म होने का समय एक जैसा नहीं रहता।
नवंबर: ठंड की शुरुआती दस्तक
नवंबर में दिन के समय धूप रहने के बावजूद सुबह और रात में मौसम ठंडा होने लगता है। ग्रामीण इलाकों में खुले स्थानों पर तापमान का अनुभव शहरी इलाकों से अलग हो सकता है। इसी समय लोग गर्म कपड़े निकालने लगते हैं और सुबह की दिनचर्या में बदलाव आने लगता है।
दिसंबर: ठंड बढ़ने का दौर
दिसंबर में रात के तापमान में गिरावट और सुबह कोहरे की स्थिति कई इलाकों में देखने को मिल सकती है। ठंडी हवाएं सक्रिय होने पर लोगों को दिन में भी ठंड महसूस हो सकती है। हालांकि, बादल और हवा की दिशा के अनुसार तापमान में उतार-चढ़ाव बना रहता है।
जनवरी: शीतलहर की आशंका वाला समय
जनवरी में बिहार के कई हिस्सों में ठंड का प्रभाव बढ़ सकता है। कुछ दिनों में न्यूनतम तापमान काफी नीचे जा सकता है और सुबह के समय घना कोहरा यातायात को प्रभावित कर सकता है। इस दौरान शीतलहर की स्थिति बनने पर विशेष सावधानी की जरूरत होती है।
फरवरी: ठंड से गर्मी की ओर बदलाव
फरवरी में दिन का तापमान सामान्य रूप से बढ़ने लगता है, लेकिन सुबह और रात में ठंड का असर बना रह सकता है। मौसम में बदलाव के कारण कुछ दिनों तक ठंड लौटने की स्थिति भी बन सकती है।
इस बार इन सामान्य मौसमी चरणों में कितना बदलाव होगा, यह आने वाले महीनों के तापमान और स्थानीय मौसम पूर्वानुमानों से अधिक स्पष्ट होगा।
अल नीनो और ला नीना में क्या है अंतर?
अल नीनो और ला नीना, दोनों प्रशांत महासागर और वायुमंडल के बीच होने वाली प्राकृतिक जलवायु प्रक्रियाओं से जुड़ी घटनाएं हैं। इनके प्रभाव एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं।
अल नीनो के दौरान मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का सतही पानी सामान्य से अधिक गर्म होता है। इसके कारण वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण और बारिश के पैटर्न में बदलाव आ सकता है।
इसके विपरीत, ला नीना के दौरान इसी क्षेत्र का समुद्री तापमान सामान्य से कम हो जाता है। इससे भी दुनिया के कई क्षेत्रों में बारिश और तापमान के पैटर्न प्रभावित होते हैं।
भारत में अल नीनो को अक्सर कमजोर मानसून और अधिक गर्मी की आशंका से जोड़ा जाता है। लेकिन हर अल नीनो वर्ष में बारिश की कमी या हर ला नीना वर्ष में अधिक बारिश होना जरूरी नहीं है। अन्य मौसमी कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसी तरह, ला नीना को सीधे कड़ाके की सर्दी और अल नीनो को पूरी सर्दी गर्म रहने की गारंटी मानना भी सही नहीं है। बिहार में ठंड का वास्तविक स्वरूप स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
क्या इस बार शीतलहर के दिन कम हो सकते हैं?
बिहार में शीतलहर का असर केवल पूरे मौसम के औसत तापमान से तय नहीं होता। कई बार औसत तापमान सामान्य से अधिक होने के बावजूद कुछ दिनों के लिए ठंडी हवाएं तेज हो सकती हैं और तापमान में अचानक गिरावट आ सकती है।
यदि सर्दियों के दौरान सामान्य से अधिक तापमान की स्थिति बनी रहती है, तो लंबे समय तक ठंड बने रहने की अवधि कम हो सकती है। लेकिन शीतलहर के दिनों की संख्या कितनी होगी, यह बताने के लिए बिहार के लिए जारी आधिकारिक मौसमी पूर्वानुमान और समय-समय पर जारी चेतावनियों को देखना जरूरी है।
इसलिए दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के दौरान बिहार में शीतलहर केवल तीन से पांच दिन ही चलेगी, जैसे किसी निश्चित आंकड़े को आधिकारिक पूर्वानुमान के बिना पक्का नहीं माना जाना चाहिए।
पटना, गया, भागलपुर, पूर्णिया और उत्तर बिहार के जिलों में मौसम की परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं। किसी जिले में कोहरे का प्रभाव अधिक हो सकता है, जबकि दूसरे इलाके में न्यूनतम तापमान अधिक नीचे जा सकता है। इसी वजह से जिला-स्तर की मौसम चेतावनियां महत्वपूर्ण रहेंगी।
क्या पश्चिमी विक्षोभ भी बिहार की ठंड को प्रभावित करेगा?
सर्दियों में उत्तर भारत के मौसम पर पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव महत्वपूर्ण होता है। यह एक मौसमी प्रणाली है, जो भूमध्यसागरीय क्षेत्र और आसपास के इलाकों से विकसित होकर पश्चिमी हिमालय तथा उत्तर भारत के मौसम को प्रभावित कर सकती है।
पश्चिमी विक्षोभ के कारण पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी और बारिश हो सकती है। मैदानी इलाकों में इसका प्रभाव बादलों, बारिश और तापमान के उतार-चढ़ाव के रूप में दिखाई दे सकता है।
बिहार में ठंड का असर केवल पश्चिमी विक्षोभ पर निर्भर नहीं करता, लेकिन उत्तर भारत की मौसमी परिस्थितियों में बदलाव का प्रभाव यहां भी महसूस किया जा सकता है। हवा की दिशा, आसमान में बादल, स्थानीय नमी और ठंडी हवाओं का प्रवाह भी तापमान को प्रभावित करते हैं।
इसलिए अल नीनो के साथ-साथ पश्चिमी विक्षोभ और अन्य मौसमी प्रणालियों पर भी नजर रखना जरूरी होगा। मजबूत अल नीनो के बावजूद कोई सक्रिय मौसमी प्रणाली कुछ दिनों के लिए ठंड बढ़ा सकती है।
रबी फसलों पर पड़ सकता है गर्म सर्दियों का असर
अल नीनो को लेकर चिंता केवल सर्दी की तीव्रता तक सीमित नहीं है। बिहार के किसानों के लिए रबी फसलों का उत्पादन भी महत्वपूर्ण विषय है। राज्य में गेहूं, सरसों, चना, मटर और अन्य रबी फसलें सर्दियों के मौसम में विकसित होती हैं। इन फसलों की बढ़वार और पैदावार पर तापमान, मिट्टी में नमी, सिंचाई और बारिश का असर पड़ता है।
यदि सर्दियों में तापमान सामान्य से अधिक रहता है और फसलों को आवश्यक ठंड नहीं मिलती, तो कुछ फसलों की वृद्धि और दाने बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। हालांकि, नुकसान कितना होगा, यह फसल की किस्म, बुवाई के समय, सिंचाई और खेत की स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
गेहूं की फसल पर क्या असर हो सकता है?
गेहूं की फसल के विकास के लिए तापमान का संतुलित रहना महत्वपूर्ण है। यदि फसल के विकास और दाना बनने के समय तापमान तेजी से बढ़ता है, तो दाने भरने की अवधि कम हो सकती है। इससे दाने के वजन और कुल उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका रहती है।
लेकिन पूरे बिहार में गेहूं की पैदावार 10 से 15 प्रतिशत तक घट जाएगी, ऐसा निष्कर्ष केवल अल नीनो के अनुमान के आधार पर नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए फसल की स्थिति, मौसम के वास्तविक आंकड़ों और कृषि विशेषज्ञों के आकलन की जरूरत होगी।
किसानों को बुवाई के समय और फसल की किस्म के चयन के लिए कृषि विभाग तथा कृषि विज्ञान केंद्रों की सलाह पर ध्यान देना चाहिए।
सरसों की फसल पर भी नजर
सरसों की फसल में तापमान और नमी का संतुलन महत्वपूर्ण होता है। अधिक तापमान और मौसम में असामान्य बदलाव फसल के विकास को प्रभावित कर सकते हैं। इसके साथ ही कीटों और रोगों की स्थिति भी मौसम तथा खेत की परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है।
इसलिए सरसों की फसल में किसी विशेष कीट या रोग का प्रकोप निश्चित रूप से बढ़ेगा, ऐसा पहले से मानना उचित नहीं होगा। किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करनी चाहिए और रोग या कीट के लक्षण दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए।
चना और मटर के उत्पादन पर संभावित असर
चना और मटर जैसी दलहनी फसलों में फूल आने और फलियां बनने के समय तापमान का विशेष महत्व होता है। अधिक गर्मी पड़ने पर फूल और फलियां बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। वहीं, मिट्टी में नमी की कमी होने पर फसल की बढ़वार भी कमजोर पड़ सकती है।
यदि सर्दियों के दौरान तापमान सामान्य से अधिक रहता है और बारिश कम होती है, तो इन फसलों की सिंचाई और देखभाल की जरूरत बढ़ सकती है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव का आकलन फसल की अवस्था और खेत की परिस्थितियों को देखकर ही किया जा सकता है।
किसानों को अभी से किन बातों पर ध्यान देना चाहिए?
बिहार में रबी फसलों की बुवाई और विकास के दौरान किसानों के लिए मौसम की जानकारी महत्वपूर्ण होगी। अल नीनो की आशंका के बीच खेती से जुड़े निर्णय केवल वैश्विक मौसम के अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लेने चाहिए।
किसानों को कृषि विभाग की सलाह, स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्रों की जानकारी और मौसम आधारित कृषि परामर्श पर नजर रखनी चाहिए। सिंचाई का समय तय करते समय मिट्टी की नमी, फसल की अवस्था और उपलब्ध पानी को ध्यान में रखना उपयोगी होगा।
इसके अलावा, फसल में किसी भी असामान्य बदलाव, रोग या कीट के लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञों की सलाह लेना बेहतर होगा। मौसम के वास्तविक आंकड़ों के आधार पर खेती की योजना में बदलाव करने से संभावित नुकसान कम करने में मदद मिल सकती है।
आम लोगों के लिए भी जरूरी है मौसम पर नजर रखना
अगर इस बार सर्दियों का औसत तापमान सामान्य से ऊपर रहता है, तब भी लोगों को ठंड से जुड़ी चेतावनियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। मौसम में अचानक बदलाव होने पर तापमान तेजी से गिर सकता है।
बुजुर्गों, बच्चों और पहले से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझ रहे लोगों को मौसम के अनुसार सावधानी बरतनी चाहिए। सुबह और रात में तापमान गिरने पर पर्याप्त गर्म कपड़े पहनना और मौसम विभाग की स्थानीय चेतावनियों पर ध्यान देना उपयोगी रहेगा।
घने कोहरे के दौरान सड़क और रेल यातायात भी प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में यात्रियों को मौसम और परिवहन से संबंधित आधिकारिक अपडेट देखकर यात्रा की योजना बनानी चाहिए।
क्या बिहार में इस बार सर्दी गायब हो जाएगी?
इस सवाल का फिलहाल सीधा जवाब देना जल्दबाजी होगी। मजबूत अल नीनो के कारण वैश्विक तापमान और बारिश के पैटर्न में बड़े बदलाव की आशंका है। WMO और NOAA के ताजा आकलन भी इस घटना की असाधारण मजबूती की ओर संकेत करते हैं।
लेकिन बिहार में सर्दियों की वास्तविक स्थिति तय करने के लिए राज्य के तापमान, ठंडी हवाओं, कोहरे और अन्य मौसमी प्रणालियों के आंकड़ों को देखना होगा। औसत तापमान सामान्य से अधिक रहने पर भी कुछ दिनों के लिए कड़ाके की ठंड और शीतलहर की स्थिति बन सकती है।
कुल मिलाकर, इस बार बिहार की सर्दियों पर अल नीनो का संभावित प्रभाव जरूर चर्चा में है, लेकिन ठंड कितनी कम पड़ेगी, शीतलहर कितने दिन चलेगी और रबी फसलों को कितना नुकसान होगा—इन सवालों का अंतिम जवाब आने वाले महीनों के मौसम और कृषि संबंधी आधिकारिक आकलन से ही मिलेगा।
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