जहानाबाद: बिहार में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर बड़े-बड़े दावों के बीच जहानाबाद सदर अस्पताल से सामने आई एक तस्वीर ने पूरे सिस्टम को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि सड़क हादसे में घायल 16 वर्षीय किशोर के पैर में गंभीर फ्रैक्चर के बावजूद प्लास्टर की जगह दवा के खाली कार्टन को बांधकर उसे पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (PMCH) रेफर कर दिया गया।
जहानाबाद का सदर अस्पताल जिला मुख्यालय का सरकारी अस्पताल है और जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर भी इसे सरकारी अस्पताल के रूप में दर्ज किया गया है।
सरकारी अस्पताल में प्लास्टर की जगह कार्टन?
मामला हुलासगंज थाना क्षेत्र के धरमपुर मोड़ के पास का बताया जा रहा है। गुरुवार को दो बाइकों की टक्कर में चार किशोर घायल हुए थे। इनमें धरमपुर निवासी 16 वर्षीय राजा कुमार को गंभीर चोट लगने के बाद जहानाबाद सदर अस्पताल की इमरजेंसी में लाया गया।
परिजनों की ओर से आरोप लगाया गया कि किशोर के पैर में फ्रैक्चर होने के बावजूद अस्पताल में प्लास्टर लगाने के बजाय खाली दवा के कार्टन को पैर के सहारे के रूप में बांध दिया गया। इसके बाद उसे PMCH रेफर कर दिया गया।
घटना से जुड़ी तस्वीर और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सवाल सिर्फ एक मरीज के इलाज तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सदर अस्पताल की इमरजेंसी व्यवस्था और स्वास्थ्य विभाग की तैयारियों पर भी सवाल उठने लगे हैं।
सरकार के स्वास्थ्य दावों के बीच ‘कार्टन इलाज’ क्यों?
सरकारी अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर लगातार दावे किए जाते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि अगर एक घायल किशोर को फ्रैक्चर की स्थिति में सदर अस्पताल लाया गया, तो उसे जरूरी प्राथमिक उपचार किस स्तर पर मिला?
क्या इमरजेंसी में प्लास्टर की सुविधा उपलब्ध थी?
अगर उपलब्ध थी तो उसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया?
और अगर उपलब्ध नहीं थी, तो जिला अस्पताल की इमरजेंसी व्यवस्था में इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
इन सवालों का जवाब अब अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को देना होगा।
वीडियो वायरल हुआ तो प्रशासन ने लिया संज्ञान
मामला सामने आने के बाद सदर अस्पताल के प्रभारी अधीक्षक डॉ. चंद्रेश्वर प्रसाद ने जांच की बात कही है। वहीं, जिलाधिकारी ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच टीम गठित करने और जांच रिपोर्ट के आधार पर जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की बात कही है।
यानी वायरल तस्वीरों ने प्रशासन को भी जवाबदेही तय करने के लिए मजबूर कर दिया है।
स्वास्थ्य विभाग के सामने सबसे बड़ा सवाल
जहानाबाद में यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि सदर अस्पताल जिला स्तर की प्रमुख सरकारी स्वास्थ्य सुविधा है। जिला प्रशासन के अनुसार जिले में एक जिला सदर अस्पताल के अलावा रेफरल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का नेटवर्क भी मौजूद है।
ऐसे में अगर सदर अस्पताल की इमरजेंसी में ही किसी फ्रैक्चर मरीज के इलाज को लेकर इस तरह का विवाद सामने आता है, तो स्वास्थ्य विभाग की निगरानी, संसाधनों और डॉक्टरों की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, अभी जांच पूरी नहीं हुई है। इसलिए यह स्पष्ट होना बाकी है कि वायरल तस्वीर में दिख रही स्थिति किन परिस्थितियों में बनी और इलाज की पूरी प्रक्रिया क्या थी।
अब निगाह जांच रिपोर्ट पर
एक तरफ घायल किशोर को बेहतर इलाज के लिए PMCH भेजे जाने की बात है, तो दूसरी तरफ वायरल तस्वीर ने सरकारी अस्पताल की व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
अब असली परीक्षा जांच टीम की रिपोर्ट की है। अगर इलाज में लापरवाही हुई है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी या मामला सिर्फ जांच तक सीमित रह जाएगा—इस पर लोगों की नजर रहेगी।
जहानाबाद के इस ‘कार्टन वाले इलाज’ ने एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ दिया है—जब मरीज सरकारी अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचे, तो उसे इलाज मिलेगा या सिर्फ रेफर की पर्ची और किसी तरह का अस्थायी सहारा?
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जहानाबाद से गौरव कुमार कि रिपोर्ट…