रांची: रांची के राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) से एक बड़ा वित्तीय घोटाले जैसा खुलासा सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ऑडिट रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एक निजी आउटसोर्सिंग एजेंसी का GST रजिस्ट्रेशन सितंबर 2025 में ही रद्द हो चुका था, लेकिन इसके बावजूद उसी एजेंसी को करोड़ों रुपये का भुगतान लगातार किया जाता रहा।
रिपोर्ट के मुताबिक, RIMS में हाउसकीपिंग और सैनिटेशन का काम कर रही इस एजेंसी को लगभग 9 करोड़ 12 लाख रुपये का भुगतान किया गया, जिसमें करीब 1 करोड़ 21 लाख रुपये GST के नाम पर भी शामिल हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब GST रजिस्ट्रेशन ही रद्द था, तो फिर टैक्स इनवॉइस के आधार पर भुगतान कैसे पास होते रहे?
ऑडिट विभाग ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि भुगतान से पहले GSTIN की ऑनलाइन जांच तक नहीं की गई, जो कि वित्तीय नियमों का गंभीर उल्लंघन माना जा रहा है। इसके साथ ही GST-TDS कटौती और उसके समायोजन में भी भारी गड़बड़ियों की आशंका जताई गई है।
रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि रजिस्ट्रेशन रद्द होने के बाद किसी भी एजेंसी को GST वसूलने या टैक्स इनवॉइस जारी करने का अधिकार नहीं होता, इसके बावजूद भुगतान जारी रहना कई सवाल खड़े करता है।
अब ऑडिट विभाग ने RIMS प्रशासन से पूरे मामले में जवाब-तलब किया है और विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। साथ ही यह भी सिफारिश की गई है कि—
- पूरी GST राशि ब्याज सहित वसूली जाए
- सभी भुगतानों का री-ऑडिट किया जाए
- GSTIN सत्यापन को अनिवार्य बनाया जाए
- आउटसोर्सिंग एजेंसियों पर निगरानी के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त हो
इतना ही नहीं, पूर्व में काम कर चुकी अन्य एजेंसियों के भुगतान की भी विशेष जांच की सिफारिश की गई है, जिससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि मामला सिर्फ एक एजेंसी तक सीमित नहीं है।
फिलहाल RIMS प्रशासन की ओर से आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है। लेकिन इस खुलासे के बाद संस्थान की वित्तीय पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
अब देखना होगा कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस कथित अनियमितता पर क्या कार्रवाई करते हैं—क्योंकि अगर आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला बड़े वित्तीय गड़बड़ी की ओर इशारा कर सकता है।
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