रांची: झारखंड में अब सरकारी सिस्टम पहले जैसा नहीं रहेगा। एक ऐसा फैसला लिया गया है, जो सीधे गांव-प्रखंड स्तर पर प्रशासन की तस्वीर बदल सकता है। सवाल भी उठ रहे हैं—क्या इससे काम तेज होगा या जिम्मेदारी का बोझ बढ़ेगा?
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में बड़ा प्रशासनिक बदलाव मंजूर किया गया है। अब जिन प्रखंडों में 12 से कम पंचायत हैं, वहां BDO (प्रखंड विकास पदाधिकारी) और CO (अंचल अधिकारी) दोनों नहीं होंगे। उनकी जगह सिर्फ एक ही अधिकारी तैनात किया जाएगा—या तो BDO या CO—जो दोनों की जिम्मेदारियां संभालेगा।
राज्य में ऐसे कुल 107 प्रखंड हैं, जहां यह नया प्रयोग लागू होगा। वहीं 12 से अधिक पंचायत वाले 164 प्रखंडों में पहले की तरह दोनों पद बने रहेंगे। सरकार का दावा है कि इससे “युक्तिसंगत पदस्थापन” होगा और प्रशासनिक कार्यक्षमता बढ़ेगी।
लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है…
क्या एक अधिकारी दो-दो जिम्मेदारियां सही तरीके से निभा पाएगा?
क्या इससे फैसले तेज होंगे या फाइलें और लंबी चलेंगी?
कैबिनेट ने सिर्फ यही नहीं, बल्कि कुल 27 प्रस्तावों को मंजूरी दी है। राजधानी रांची में धुर्वा गोलचक्कर से पुलिस मुख्यालय तक सड़क को स्मार्ट बनाने की योजना पास हुई है, जिसमें साइकिल ट्रैक, पैदल पथ और बैठने की व्यवस्था शामिल होगी।
रोजगार के मोर्चे पर भी बड़ा बदलाव किया गया है। मनरेगा की जगह “विकसित भारत गारंटी” मिशन लागू करने का फैसला लिया गया है, जिसमें रोजगार के दिनों को बढ़ाने की बात कही गई है, खासकर आदिम जनजातियों के लिए अतिरिक्त काम का प्रावधान किया गया है।
सबसे अहम फैसला पानी को लेकर रहा। सोन नदी के जल बंटवारे पर झारखंड और बिहार के बीच सहमति बन गई है, जिससे लंबे समय से चला आ रहा विवाद खत्म होने की उम्मीद है। इससे सिंचाई परियोजनाओं को भी गति मिल सकती है।
झारखंड सरकार का यह फैसला एक तरह से “कम संसाधन, ज्यादा काम” का मॉडल है। अब देखना यह होगा कि यह प्रयोग जमीन पर कितना सफल होता है—क्योंकि असली परीक्षा तो अब शुरू होगी।
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