पटना। बिहार की सियासत में राजद ने अचानक ऐसा फैसला लिया है, जिसने पार्टी के भीतर चल रही हलचल को सतह पर ला दिया है। तेजस्वी यादव ने राजद की सभी स्तरों की संगठनात्मक इकाइयों को भंग कर दिया है। यह फैसला ऐसे वक्त में आया है, जब बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने पार्टी के सामने नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
पार्टी के भीतर इसे महज संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि सियासी रणनीति के ‘रीसेट बटन’ के तौर पर देखा जा रहा है। चर्चा यह भी है कि तेजस्वी यादव को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चल रहे दो नैरेटिव ने पार्टी की परेशानी बढ़ाई।
दो अफवाहें, जिसने बढ़ाई राजद की चिंता
राजनीतिक चर्चा के मुताबिक तेजस्वी यादव को लेकर दो बातें तेजी से फैलीं। पहली—उनका केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ कथित गुप्त समझौता हो गया है और वे सिर्फ विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं। दूसरी—तेजस्वी यादव भारत छोड़कर यूरोप जाने और वहां की नागरिकता लेने की तैयारी में हैं।
इन दोनों दावों का कोई स्वतंत्र पुष्ट प्रमाण सामने नहीं है। लेकिन राजद के भीतर यह चिंता जरूर बताई जा रही है कि लगातार फैलते ऐसे नैरेटिव ने पार्टी के समर्थकों के बीच भ्रम पैदा किया।
बांकीपुर में प्रशांत किशोर को मिला फायदा?
इसी राजनीतिक माहौल के बीच बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की सक्रियता ने राजद के लिए चुनौती बढ़ा दी। रिपोर्ट के मुताबिक, राजद के पारंपरिक वोट बैंक के एक हिस्से में भी सेंध लगाने की कोशिश हुई।
तेजस्वी यादव की चुनावी अवधि में अनुपस्थिति को लेकर भी पार्टी के भीतर सवाल उठे। विरोधियों ने इसे मुद्दा बनाया, जबकि समर्थकों के बीच उनकी मौजूदगी को लेकर चर्चा होती रही।
अब संगठन में होगा बड़ा फेरबदल
राजद ने संगठन की सभी इकाइयों को भंग कर साफ संकेत दिया है कि पार्टी पुराने ढर्रे पर आगे बढ़ने के बजाय नए सिरे से संगठन तैयार करना चाहती है।
सूत्रों के मुताबिक, जिला और प्रखंड स्तर पर बड़े पैमाने पर बदलाव हो सकता है। पुराने अध्यक्षों को हटाए जाने की संभावना है, लेकिन उन्हें पार्टी में दूसरी जिम्मेदारियां देने की रणनीति पर भी विचार किया जा रहा है।
पार्टी का फोकस बताया जा रहा है—पुराने कार्यकर्ताओं को सम्मान और नए चेहरों को जिम्मेदारी।
सवाल सिर्फ संगठन का नहीं, नैरेटिव का भी है
राजद के सामने चुनौती सिर्फ संगठन को मजबूत करने की नहीं है। उससे बड़ा सवाल यह है कि पार्टी अपने नेता तेजस्वी यादव की राजनीतिक छवि और संदेश को जमीनी स्तर तक कितनी मजबूती से पहुंचा पाती है।
राजनीति में अफवाहें तभी ताकतवर बनती हैं, जब उनका समय रहते जवाब नहीं दिया जाता। यही वजह है कि राजद अब संगठन के साथ-साथ कम्युनिकेशन और नैरेटिव की लड़ाई को भी गंभीरता से लेने की कोशिश करता दिख रहा है।
तेजस्वी के लिए सबसे बड़ी चुनौती—कार्यकर्ता से दूरी खत्म करना
वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्क के मुताबिक, विपक्ष की राजनीति करने वाले नेता के लिए लगातार जनता और कार्यकर्ताओं के बीच मौजूद रहना जरूरी है। राजद के समर्पित कार्यकर्ताओं की ओर से भी तेजस्वी यादव से लगातार संवाद बनाए रखने की अपेक्षा सामने आती रही है।
राजद के वरिष्ठ नेता उदय नारायण चौधरी भी पहले कार्यकर्ताओं से लगातार मिलने की जरूरत पर जोर दे चुके हैं।
क्या राजद का नया संगठन नई कहानी लिखेगा?
राजद का संगठन भंग होना अपने आप में बड़ा राजनीतिक संदेश है। अब असली परीक्षा नए संगठन के गठन के बाद होगी।
क्या नए चेहरे पार्टी में ऊर्जा भर पाएंगे? क्या पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर होगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या तेजस्वी यादव अपने खिलाफ चल रहे राजनीतिक नैरेटिव को पलट पाएंगे?
बांकीपुर का झटका राजद के लिए सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि संगठन और रणनीति पर पुनर्विचार का संकेत बनता दिख रहा है। आने वाले दिनों में नए संगठन का चेहरा बताएगा कि राजद ने सिर्फ पद बदले हैं या सचमुच अपनी राजनीतिक रणनीति भी बदलने की तैयारी कर ली है।
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