मुजफ्फरपुर: घोसौत गांव की उस सुबह में सिर्फ एक पिता की विदाई नहीं थी, बल्कि समाज की सोच को बदल देने वाला एक भावुक क्षण भी था। 65 वर्षीय दुर्गा सहनी के निधन के बाद जहां बेटा न होने की चर्चा हो रही थी, वहीं उनकी तीन बेटियों ने चुपचाप वह जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली, जिसे अक्सर समाज बेटों तक सीमित कर देता है।
घर के आंगन से उठती अर्थी… और उसे कंधा देती तीन बेटियां—यह दृश्य देख हर आंख नम हो गई। बेटियों के चेहरे पर दर्द था, लेकिन उससे बड़ा था अपने पिता के प्रति उनका प्रेम और कर्तव्य।
विरोध के बीच भी नहीं डगमगाईं बेटियां
जब बेटियों ने पिता को मुखाग्नि देने का निर्णय लिया, तो कुछ लोगों ने इसका विरोध किया। माहौल तनावपूर्ण हो गया, धक्का-मुक्की तक की नौबत आ गई। लेकिन बेटियां नहीं रुकीं… वे जानती थीं कि यह सिर्फ एक रस्म नहीं, उनके पिता के प्रति आखिरी फर्ज है।
सबसे छोटी बेटी ने दी अंतिम विदाई
श्मशान घाट पर जब सबसे छोटी बेटी पिंकी देवी ने कांपते हाथों से मुखाग्नि दी, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। उस पल में दर्द भी था, साहस भी… और एक गहरा संदेश भी—कि प्यार और जिम्मेदारी का कोई लिंग नहीं होता।
साथ नहीं आए अपने, फिर भी नहीं टूटी हिम्मत
इस पूरे सफर में कई अपने दूर रहे, कोई साथ नहीं चला… लेकिन तीनों बेटियां और उनका नाती ही पिता की अंतिम यात्रा के सच्चे साथी बने। उन्होंने बिना किसी सहारे के हर रस्म पूरी की।
समाज के लिए एक संदेश
यह घटना सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो हर जिम्मेदारी निभाने में सक्षम हैं।
घोसौत गांव की इन बेटियों ने यह साबित कर दिया—बेटियां सिर्फ घर की शान नहीं, हर फर्ज निभाने की ताकत भी होती हैं।
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