मधुबनी: मधुबनी समाहरणालय से जुड़ी जमीन की प्रस्तावित नीलामी को लेकर एक बार फिर जिले में चर्चा तेज हो गई है। सिविल कोर्ट, मधुबनी की ओर से जारी बिक्री उद्घोषणा में समाहरणालय भवन से जुड़ी जमीन को नीलामी प्रक्रिया में शामिल किया गया है। न्यायालयी दस्तावेज के अनुसार यह कार्रवाई आर्बिट्रेशन एक्जीक्यूशन वाद संख्या 03/2016 से संबंधित है। प्रस्तावित सार्वजनिक नीलामी की तारीख 5 नवंबर 2026 बताई गई है।
मामला मेसर्स राधा कृष्णा एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड और पंडौल को-ऑपरेटिव स्पिनिंग मिल्स प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य के बीच लंबे समय से चले आ रहे वित्तीय विवाद से जुड़ा है। संबंधित पक्ष की ओर से वर्षों से बकाया राशि की वसूली के लिए न्यायालय में निष्पादन की कार्रवाई चल रही है। पुराने न्यायालयी रिकॉर्ड और हालिया बिक्री उद्घोषणा को मिलाकर देखें तो विवाद की जड़ करीब एक दशक से अधिक पुरानी है।
4 करोड़ 17 लाख 24 हजार 459 रुपये का दावा
न्यायालय में चले मामले के अनुसार राधा कृष्णा एक्सपोर्ट्स की ओर से पंडौल को-ऑपरेटिव सूता मिल के संचालन से संबंधित पूंजी और कच्चे माल के लिए राशि लगाए जाने का दावा किया गया था। कंपनी की ओर से भुगतान किए गए पैसे की वापसी को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
मामले में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति घनश्याम प्रसाद को आर्बिट्रेटर बनाया गया था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 2012 में शुरू हुई मध्यस्थता प्रक्रिया के बाद भुगतान से संबंधित आदेश आया। बाद के वर्षों में ब्याज सहित बकाया राशि बढ़कर 4 करोड़ 17 लाख 24 हजार 459 रुपये बताई गई।
1990 के दशक में बंद हुई थी सूता मिल
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि पंडौल की को-ऑपरेटिव सूता मिल से जुड़ी है। उपलब्ध पुराने विवरण के अनुसार मिल 1996-97 के आसपास बंद हो गई थी। इसके बाद राधा कृष्णा एक्सपोर्ट्स के निदेशक रतन कुमार केडिया और मिल से जुड़े अधिकारियों के बीच मिल के संचालन के लिए समझौते की बात सामने आई।
बताया गया कि कंपनी की ओर से मिल के लिए पूंजी और कच्चा माल उपलब्ध कराया गया। इसके एवज में भुगतान को लेकर बाद में विवाद पैदा हुआ। कंपनी की ओर से बकाया राशि की मांग की गई और मामला मध्यस्थता तक पहुंचा।
2012 के आर्बिट्रेशन आदेश से शुरू हुई कानूनी लड़ाई
उपलब्ध न्यायालयी घटनाक्रम के अनुसार आर्बिट्रेटर के समक्ष रिक्वेस्ट केस संख्या 7/2012 में मामला पहुंचा। पुराने विवरण में एडवांस भुगतान, क्षतिपूर्ति, मुकदमा खर्च और आर्बिट्रेटर की फीस समेत अलग-अलग मदों में राशि के भुगतान का उल्लेख है। भुगतान में देरी होने पर ब्याज के साथ रकम चुकाने की बात भी आदेश में बताई गई थी।
जब आदेश के अनुसार भुगतान नहीं हुआ तो 2016 में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के न्यायालय में आर्बिट्रेशन एक्जीक्यूशन वाद संख्या 03/2016 दाखिल किया गया। यहीं से समाहरणालय की जमीन और भवन की नीलामी से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी।
2025 में भी चिपकाया गया था नोटिस
इस मामले में नया घटनाक्रम पहली बार सामने नहीं आया है। जून 2025 में भी मधुबनी समाहरणालय के मुख्य द्वार के पास न्यायालय का नोटिस चिपकाया गया था। उस समय अदालत की ओर से 15 दिनों के भीतर करीब 4.17 करोड़ रुपये के भुगतान का अवसर दिया गया था और भुगतान नहीं होने पर समाहरणालय की संपत्ति की नीलामी की चेतावनी दी गई थी।
उस समय सिविल कोर्ट के नाजिर की मौजूदगी में नोटिस चस्पा किया गया था। संबंधित पक्ष के अधिवक्ताओं ने दावा किया था कि लंबे समय से बकाया राशि का भुगतान नहीं होने के कारण निष्पादन की कार्रवाई आगे बढ़ाई गई। उस समय तत्कालीन जिलाधिकारी ने भी नोटिस और आदेश से अवगत होने के बाद आवश्यक कदम उठाने की बात कही थी।
अब बिक्री उद्घोषणा में जमीन का स्पष्ट विवरण
2026 की हालिया बिक्री उद्घोषणा में नगर मौजा स्थित खेसरा संख्या 4899 की जमीन का उल्लेख है। उपलब्ध विवरण के अनुसार कुल भूखंड में से दक्षिणी हिस्से की 2 कट्ठा 5 धुर 67 धुरकी जमीन नीलामी प्रक्रिया के दायरे में बताई गई है। इसी हिस्से पर दो मंजिला कलेक्ट्रेट भवन मौजूद है।
दस्तावेज में जमीन की चौहद्दी भी बताई गई है। उत्तर में नगर थाना, दक्षिण में व्यवहार न्यायालय, पूरब में सड़क और पश्चिम में न्यायालय परिसर का उल्लेख है। नीलामी की प्रक्रिया सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 21 के नियम 66 के तहत बिक्री उद्घोषणा जारी किए जाने से जुड़ी बताई गई है।
5 नवंबर को क्या होगा?
न्यायालय की ओर से जारी वर्तमान सूचना के अनुसार 5 नवंबर 2026 को सार्वजनिक नीलामी प्रस्तावित है। हालांकि, नीलामी का नोटिस जारी होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि समाहरणालय भवन बिक चुका है या 5 नवंबर को हर हाल में बिक्री पूरी हो जाएगी। आगे की प्रक्रिया न्यायालय के आदेश, निर्धारित शर्तों और संबंधित कानूनी कार्रवाई पर निर्भर करेगी।
यानी फिलहाल स्थिति यह है कि कलेक्ट्रेट से जुड़ी चिन्हित जमीन न्यायालयी निष्पादन प्रक्रिया में नीलामी के लिए रखी गई है। अंतिम स्थिति न्यायालयी कार्यवाही के बाद ही स्पष्ट होगी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
मधुबनी समाहरणालय जिले की प्रशासनिक व्यवस्था का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में उससे जुड़ी जमीन और उस पर बने सरकारी भवन का न्यायालयी नीलामी प्रक्रिया में आना असामान्य घटनाक्रम है। यही वजह है कि 2025 में सामने आए नोटिस के बाद एक बार फिर 2026 की बिक्री उद्घोषणा ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा बढ़ा दी है।
फिलहाल पूरे मामले की अगली नजर 5 नवंबर की प्रस्तावित न्यायालयी नीलामी और उससे पहले होने वाली कानूनी कार्रवाई पर है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि लंबे समय से चले आ रहे 4.17 करोड़ रुपये से अधिक के बकाये के इस विवाद का अंतिम समाधान किस स्तर पर और किस प्रक्रिया से होता है।
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