किशनगंज: बारिश की बूंदों के साथ ही किशनगंज के एक गांव की सड़क दलदल में बदल गई… रास्ते बंद हो गए… वाहन गांव तक पहुंचना बंद हो गए… और इसी बीच एक बुजुर्ग महिला की तबीयत बिगड़ गई।
इलाज की जरूरत थी, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही सड़क सबसे बड़ी चुनौती बन गई। आखिरकार ग्रामीणों ने जो किया, उसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए।
किशनगंज जिले के टेढ़ागाछ प्रखंड के कास्त खर्रा गांव में बीमार वृद्ध महिला अलेतून निशा को अस्पताल पहुंचाने के लिए ना एंबुलेंस आई, ना कोई चार पहिया वाहन पहुंच सका। वजह थी बारिश के बाद सड़क पर जमा घुटनों तक कीचड़।
मजबूरी में गांव के तौसीफ आलम और तबरेज आलम ने इंसानियत की मिसाल पेश की। उन्होंने एक कुर्सी को ही सहारा बनाया और बीमार महिला को उस पर बैठाकर कीचड़ भरे रास्ते से करीब डेढ़ किलोमीटर तक पैदल चले।
हर कदम पर कीचड़ था… रास्ता मुश्किल था… लेकिन सामने एक जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी थी। ग्रामीणों की मेहनत के बाद महिला को मुख्य सड़क तक पहुंचाया गया, जहां से टेंपो के जरिए उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र टेढ़ागाछ ले जाया गया।
लेकिन यह सिर्फ एक बुजुर्ग महिला को अस्पताल पहुंचाने की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था की तस्वीर है, जहां आज भी कई गांवों में बीमारी से पहले सड़क से लड़ना पड़ता है।
सरकारें ग्रामीण विकास, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और हर गांव तक सड़क पहुंचाने के दावे करती हैं, लेकिन किशनगंज की यह तस्वीर उन दावों पर सवाल खड़ा करती है। करोड़ों रुपये के बजट के बावजूद अगर मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए कुर्सी का सहारा लेना पड़े, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है।
ग्रामीणों का कहना है कि हर साल बारिश के मौसम में यही समस्या सामने आती है। सड़क निर्माण और जल निकासी के लिए कई बार मांग की गई, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं हो सका।
गांव वालों का सवाल है—“जब गांव तक एंबुलेंस नहीं पहुंच सकती, तो आपात स्थिति में जिंदगी कैसे बचेगी?”
यह तस्वीर सिर्फ किशनगंज की नहीं, बल्कि उन तमाम गांवों की कहानी है जहां आज भी विकास की सड़क पहुंचने का इंतजार कर रही है।
अब देखना होगा कि कुर्सी को एंबुलेंस बनाने वाली यह मजबूरी प्रशासन और सरकार की व्यवस्था में कितना बदलाव ला पाती है।
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