रांची: झारखंड में अनुसूचित जाति (दलित) आयोग के गठन को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। राज्य में दलित आयोग नहीं होने के मुद्दे पर कांग्रेस जहां सरकार पर जल्द फैसला लेने का दबाव बना रही है, वहीं भाजपा ने कांग्रेस और हेमंत सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
झारखंड में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 39.85 लाख है, जो राज्य की कुल आबादी का लगभग 12 प्रतिशत है। यही वजह है कि दलित समुदाय से जुड़े मुद्दे लंबे समय से प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रहे हैं।
महागठबंधन सरकार में कांग्रेस पिछले कुछ समय से दलित आयोग के गठन की मांग को लेकर सक्रिय है। पार्टी का कहना है कि आयोग बनने से अनुसूचित जाति समाज की समस्याओं की पहचान और उनके समाधान के लिए बेहतर व्यवस्था तैयार हो सकेगी।
कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने कहा कि उन्होंने पार्टी स्तर और व्यक्तिगत रूप से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से आयोग गठन का आग्रह किया है। उन्होंने साफ कहा कि कांग्रेस इस मांग को लेकर अपना अभियान जारी रखेगी और सरकार पर दबाव बनाएगी।
हालांकि, वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर द्वारा मुख्यमंत्री को पत्र लिखे जाने के बाद यह मुद्दा फिलहाल राजनीतिक गलियारों में धीमा पड़ता दिख रहा है। वित्त मंत्री पहले इस मुद्दे पर मुखर रहे हैं, लेकिन अब उनकी चुप्पी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
इधर भाजपा ने इस मुद्दे को लेकर राज्य सरकार पर हमला बोला है। भाजपा विधायक सीपी सिंह ने कहा कि अगर सरकार की मंशा दलित समाज के उत्थान की होती तो अब तक आयोग का गठन हो चुका होता। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के पास इच्छाशक्ति की कमी है।
सीपी सिंह ने कहा कि दलित आयोग बनने से समाज के दबे-कुचले और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की वास्तविक स्थिति सामने आती। यह पता लगाया जा सकता था कि आरक्षण का लाभ मिलने के बावजूद कई लोगों का जीवन स्तर क्यों नहीं सुधरा और उनके विकास के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो झारखंड में दलित आयोग का मुद्दा आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। कांग्रेस जहां इसे सामाजिक न्याय से जोड़ रही है, वहीं भाजपा इसे सरकार की कार्यशैली और इच्छाशक्ति से जोड़कर निशाना साध रही है।