गोपालगंज: गंडक नदी का जलस्तर घटने के बाद गोपालगंज के तटबंधों और राहत शिविरों में शरण लिए लोग अपने-अपने गांवों की ओर लौटने लगे हैं, लेकिन असली तबाही का मंजर अब सामने आ रहा है। बाढ़ का पानी तो उतर गया, लेकिन अपने पीछे बर्बादी की ऐसी छाप छोड़ गया है जिसने पीड़ितों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। आंगन में घुटा हुआ कीचड़, सड़ी हुई सामग्री की दुर्गंध और ढहे हुए आशियाने पीड़ितों के आंसुओं का कारण बने हुए हैं।
जिंदगी फिर से बसाने की चुनौती
दिनों तक तटबंधों पर दिन-रात गुजारने के बाद जब लोग घर लौटे, तो गृहस्थी का सारा सामान अनाज, कपड़े और फर्नीचर पूरी तरह तबाह मिला। कच्चे मकान ढह गए हैं और पक्के मकानों में दरारें आ गई हैं। सबसे विकराल स्थिति मवेशियों की है, जिनके सामने हरे चारे का भारी संकट खड़ा हो गया है।
महामारी का खतरा और बुनियादी सुविधाएं
पेयजल स्रोत दूषित हो चुके हैं, जिससे हैजा और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। प्रशासनिक और मेडिकल टीमें गांव-गांव पहुंचकर स्वास्थ्य जांच और ब्लीचिंग पाउडर के छिड़काव में जुटी हैं, लेकिन कटे हुए संपर्क मार्ग राहत सामग्री के त्वरित वितरण में बड़ी बाधा बन रहे हैं।
मुआवजे और सरकारी मदद की आस
फिलहाल, बेबस परिवार खुद फावड़ा और बाल्टी उठाकर अपने आशियाने साफ कर रहे हैं। नुकसान का दायरा विशाल होने के कारण पीड़ित अब सरकार से जल्द से जल्द पुनर्वास सहायता और मुआवजे की मांग कर रहे हैं ताकि जिंदगी फिर से पटरी पर लौट सके।
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