पटना: बिहार की सियासत में एक बार फिर मंत्री पद को लेकर संवैधानिक बहस तेज हो गई है। पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच चुकी है। गैर-विधायक रहते हुए दोबारा मंत्री बनाए जाने के फैसले पर सवाल उठाते हुए जनहित याचिका दाखिल की गई है, जिस पर अब 7 अगस्त को सुनवाई होगी।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि संविधान के अनुच्छेद 164(4) की छह महीने वाली व्यवस्था का इस्तेमाल बार-बार कर दीपक प्रकाश को मंत्री पद पर बनाए रखने की कोशिश की गई। याचिका में दावा किया गया है कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ है।
विपक्ष अब इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर है और सवाल उठा रहा है कि आखिर एक गैर-निर्वाचित व्यक्ति को बार-बार मंत्री पद पर बनाए रखने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या सरकार संवैधानिक नियमों की अनदेखी कर रही है?
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले एसआर चौधरी बनाम पंजाब सरकार (2001) का हवाला देते हुए कहा गया है कि गैर-विधायक मंत्री को मिलने वाली छह महीने की छूट का इस्तेमाल बार-बार नहीं किया जा सकता।
अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी है। अगर अदालत याचिका में उठाए गए सवालों को गंभीर मानती है तो इसका असर सिर्फ दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर नहीं, बल्कि भविष्य में गैर-विधायक मंत्रियों की नियुक्ति के पूरे नियम पर पड़ सकता है।
सरकार के लिए यह मामला अब सिर्फ एक मंत्री की कुर्सी का नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था और राजनीतिक नैतिकता की अग्निपरीक्षा बन गया है।
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