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Bihar: 7 महिलाओं की मौत… और जांच में बड़े अफसर बेदाग; अशोकधाम की भगदड़ के लिए सिर्फ बिजली का पोल और बैरिकेडिंग ही जिम्मेदार थे?

लखीसराय/पटना: अशोकधाम मंदिर में 17 अगस्त को हुई दर्दनाक भगदड़ में सात महिला श्रद्धालुओं की मौत के बाद सामने आई...

लखीसराय/पटना: अशोकधाम मंदिर में 17 अगस्त को हुई दर्दनाक भगदड़ में सात महिला श्रद्धालुओं की मौत के बाद सामने आई जिलास्तरीय जांच रिपोर्ट ने हादसे की जांच को लेकर ही कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एडीएम नीरज कुमार की अध्यक्षता में गठित जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट डीएम शैलेंद्र कुमार को सौंप दी है। रिपोर्ट में बिजली का पोल गिरने और कमजोर बैरिकेडिंग को हादसे का मुख्य कारण बताया गया है और प्रथम दृष्टया बिजली विभाग तथा भवन प्रमंडल की लापरवाही की बात कही गई है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हादसे के समय हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ मौजूद थी, तो भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे प्रशासन, पुलिस और मंदिर प्रबंधन की भूमिका पर जांच रिपोर्ट में कोई बड़ी जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई?

सात महिलाओं की जान चली गई, कई परिवारों ने अपने परिजनों को खो दिया, लेकिन जांच का दायरा बिजली के पोल और बैरिकेडिंग तक सीमित नजर आ रहा है। ऐसे में मृतकों के परिजन और आम श्रद्धालु पूछ रहे हैं कि क्या भगदड़ केवल एक पोल और बैरिकेडिंग की वजह से हुई या फिर इसके पीछे सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी चूक भी थी?

‘जांच के नाम पर खानापूर्ति?’ उठने लगे सवाल

जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद सबसे बड़ा विवाद यही है कि जिन अधिकारियों और व्यवस्थाओं पर हादसे के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी थी, उनकी भूमिका पर रिपोर्ट में अपेक्षित सवाल क्यों नहीं उठाए गए।

हादसे के समय मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे। रिपोर्ट के अनुसार पोल गिरने के बाद अफरा-तफरी मची और भीड़ का दबाव बढ़ गया। कमजोर बैरिकेडिंग टूट गई और कई महिलाएं एक-दूसरे के ऊपर गिर गईं। इसी दौरान सात महिलाओं की मौत हो गई।

लेकिन सवाल यह है कि इतनी बड़ी भीड़ के लिए पहले से क्राउड मैनेजमेंट प्लान क्या था?

कितने पुलिसकर्मी तैनात थे?
कहां-कहां बैरिकेडिंग लगाई गई थी?
एंट्री और एग्जिट के रास्ते कितने थे?
भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कौन अधिकारी जिम्मेदार था?
भगदड़ शुरू होने के बाद तत्काल क्या कदम उठाए गए?

इन सवालों के स्पष्ट जवाब जांच रिपोर्ट में दिखाई नहीं देते।

50 हजार श्रद्धालुओं की भीड़, फिर सुरक्षा व्यवस्था कहां थी?

सावन के तीसरे सोमवार को अशोकधाम में करीब 50 हजार श्रद्धालुओं के पहुंचने की बात सामने आई है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों के आने की संभावना किसी से छिपी नहीं थी।

ऐसे में सवाल सीधे जिला प्रशासन की तैयारी पर उठता है।

अगर प्रशासन को पहले से पता था कि सोमवार को मंदिर में भारी भीड़ उमड़ेगी, तो क्या भीड़ के दबाव का वैज्ञानिक आकलन किया गया था? क्या संवेदनशील स्थानों की पहले से जांच कराई गई थी? क्या कमजोर बैरिकेडिंग को चिन्हित किया गया था? क्या बिजली के खंभों की सुरक्षा की समीक्षा हुई थी?

यदि इन सवालों का जवाब ‘हां’ है, तो फिर हादसा कैसे हुआ?

और यदि ऐसी कोई तैयारी नहीं हुई थी, तो जवाबदेही केवल बिजली विभाग और भवन प्रमंडल तक क्यों सीमित हो?

पोल गिरा, लेकिन भगदड़ को संभालने की व्यवस्था क्यों नहीं संभली?

जांच रिपोर्ट में बिजली का पोल गिरना हादसे की शुरुआत माना गया है। पोल गिरने के बाद श्रद्धालुओं के बीच अफरा-तफरी मची और भीड़ का दबाव बढ़ा। इसके बाद कमजोर बैरिकेडिंग टूट गई।

यहां एक अहम सवाल सामने आता है—किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन में अचानक अफरा-तफरी की स्थिति को देखते हुए प्रशासन के पास इमरजेंसी क्राउड कंट्रोल प्लान क्यों नहीं था?

यदि एक पोल गिरने मात्र से हजारों की भीड़ बेकाबू हो गई और सात लोगों की जान चली गई, तो यह केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि पूरी सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती पर सवाल खड़ा करता है।

बैरिकेडिंग कमजोर थी तो पहले निरीक्षण किसने किया?

रिपोर्ट में भवन प्रमंडल की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं और बैरिकेडिंग को कमजोर बताया गया है।

लेकिन दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है—बैरिकेडिंग की मजबूती की जांच आयोजन से पहले किस अधिकारी ने की थी?

यदि बैरिकेडिंग कमजोर थी तो उसे दुरुस्त क्यों नहीं कराया गया?
यदि जांच हुई थी तो उसे सुरक्षित कैसे घोषित किया गया?
और यदि जांच ही नहीं हुई तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

सिर्फ यह कहना कि बैरिकेडिंग कमजोर थी, उस व्यवस्था को लागू कराने और उसकी निगरानी करने वाली पूरी प्रशासनिक श्रृंखला को सवालों से बाहर नहीं कर सकता।

सुरक्षा व्यवस्था पर रिपोर्ट की ‘चुप्पी’ सबसे बड़ा सवाल

रिपोर्ट में बिजली विभाग और भवन प्रमंडल पर प्रथम दृष्टया जिम्मेदारी तय किए जाने की बात सामने आई है। लेकिन पुलिस, प्रशासन और मंदिर प्रबंधन की भूमिका पर वैसी स्पष्ट जिम्मेदारी तय नहीं की गई है।

यही रिपोर्ट का सबसे विवादित हिस्सा बन गया है।

क्योंकि भगदड़ किसी बंद कमरे में नहीं हुई थी। यह एक सार्वजनिक धार्मिक स्थल पर हुई, जहां हजारों श्रद्धालुओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी कई स्तरों पर तय थी।

अगर बिजली का पोल गिरना हादसे की वजह था, तो भीड़ को संभालना किसकी जिम्मेदारी थी?

अगर बैरिकेडिंग टूटना कारण था, तो बैरिकेडिंग की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी?

अगर भीड़ अचानक बढ़ी, तो उसे नियंत्रित करने के लिए पुलिस और प्रशासन ने क्या किया?

इन सवालों का जवाब केवल तकनीकी जांच से नहीं मिल सकता।

‘बिल्ली को दूध की रखवाली’ वाली स्थिति का आरोप

जांच प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि किसी जांच समिति में ऐसे अधिकारी को शामिल किया गया हो, जिसकी भूमिका या जिम्मेदारी को लेकर पहले से सवाल उठ रहे हों, तो निष्पक्षता पर स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा हो सकता है।

यही वजह है कि पूरे मामले में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या जांच वास्तव में जिम्मेदारी तय करने के लिए थी या सिर्फ हादसे की वजह बताकर फाइल बंद करने के लिए?

हालांकि, किसी अधिकारी को दोषी ठहराने के लिए स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। लेकिन सात मौतों वाले मामले में जांच की पारदर्शिता पर सवाल उठना भी प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी है।

बड़े सवालों के घेरे में जिला प्रशासन

हादसे के बाद अब सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासन की तैयारियों पर है।

यदि करीब 50 हजार श्रद्धालुओं के आने की संभावना थी तो:

  • भीड़ नियंत्रण की विस्तृत योजना कहां थी?
  • पुलिस बल की पर्याप्त तैनाती क्यों नहीं हुई?
  • संवेदनशील स्थानों की पहले से जांच क्यों नहीं हुई?
  • कमजोर बैरिकेडिंग को पहले क्यों नहीं बदला गया?
  • बिजली के खंभों की सुरक्षा का निरीक्षण क्यों नहीं हुआ?
  • एंट्री और एग्जिट व्यवस्था की समीक्षा किसने की?
  • भगदड़ की स्थिति के लिए इमरजेंसी प्लान क्या था?
  • मंदिर प्रबंधन की भूमिका की पूरी जांच क्यों नहीं हुई?
  • मौके पर मौजूद अधिकारियों की जिम्मेदारी स्पष्ट क्यों नहीं की गई?

इन सवालों का जवाब सात मृत महिलाओं के परिवारों के लिए बेहद जरूरी है।

हादसे की तस्वीरें और वीडियो ने भी उठाए सवाल

घटना के बाद सामने आए वीडियो में भगदड़ के दौरान महिलाओं के गिरने और भीड़ के दबाव की स्थिति दिखाई देने की बात सामने आई है। घटनास्थल की तस्वीरों में बैरिकेडिंग टूटने और बिजली के खंभे से जुड़े हालात भी सामने आए।

ऐसे में जांच केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि पोल क्यों गिरा और बैरिकेडिंग क्यों टूटी।

जांच का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण हिस्सा यह होना चाहिए कि पोल गिरने के बाद सात लोगों की मौत होने तक प्रशासनिक व्यवस्था क्यों नहीं संभल सकी?

जिम्मेदारी तय किए बिना न्याय अधूरा

अशोकधाम हादसे में सात महिलाओं की मौत कोई सामान्य प्रशासनिक घटना नहीं है। यह ऐसी त्रासदी है, जिसमें सुरक्षा व्यवस्था की हर कड़ी की जांच जरूरी है।

बिजली विभाग या भवन प्रमंडल की लापरवाही सामने आती है तो कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही भीड़ प्रबंधन, पुलिस तैनाती, मंदिर प्रबंधन, एंट्री-एग्जिट व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पोल क्यों गिरा। सवाल यह भी है कि पोल गिरने के बाद सात महिलाओं को बचाने वाली व्यवस्था क्यों नहीं संभल सकी।

अब डीएम की समीक्षा पर टिकी निगाहें

एडीएम नीरज कुमार की अध्यक्षता वाली जांच टीम ने रिपोर्ट डीएम शैलेंद्र कुमार को सौंप दी है। अब डीएम स्तर से रिपोर्ट की समीक्षा की जानी है। इसी समीक्षा से यह स्पष्ट होगा कि आगे किन अधिकारियों या विभागों पर कार्रवाई होती है।

लेकिन मृतकों के परिवार और श्रद्धालुओं के मन में सवाल पहले से खड़े हैं।

क्या जांच सिर्फ दो विभागों की तकनीकी लापरवाही तक सीमित रहेगी?

या फिर उन सभी लोगों की जवाबदेही तय होगी, जिन पर उस दिन हजारों श्रद्धालुओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी?

क्योंकि सात महिलाओं की मौत के बाद अगर जिम्मेदारी सिर्फ पोल और बैरिकेडिंग तक सीमित कर दी गई, तो सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा—क्या अशोकधाम भगदड़ की जांच ने हादसे की पूरी सच्चाई खोजी, या सिर्फ जिम्मेदारी का एक छोटा हिस्सा तय करके मामला खत्म करने की कोशिश की गई?

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Mahuaa News

Author at mahuaanews.com
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