नालंदा: राजगीर से आई इस खबर ने खाकी पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। कानून की रक्षा करने वाला ही जब कानून बेचने लगे, तो सिस्टम पर भरोसा डगमगाना लाजिमी है। ताजा मामला राजगीर थाना का है, जहां एक दारोगा को रिश्वत लेते रंगे हाथ दबोच लिया गया—और वो भी किसी छोटी रकम पर नहीं, पूरे 90 हजार रुपये पर सौदा फाइनल हुआ था।
गिरफ्तार दारोगा की पहचान देवकांत कुमार के रूप में हुई है, जो राजगीर थाना में पदस्थापित थे। कहानी सिर्फ रिश्वत की नहीं, बल्कि उस “सिस्टम” की है जहां इंसाफ की कीमत तय होती है। आरोप है कि आर्म्स एक्ट के एक मामले में डायरी में मदद करने के नाम पर उन्होंने मोटी रकम की मांग की।
शिकायतकर्ता डॉ. रविशंकर कुमार का दावा है कि उन्हें झूठे केस में फंसाकर पहले ही 20 हजार रुपये वसूले जा चुके थे। इसके बाद एक लाख रुपये की नई डिमांड रखी गई। मोलभाव के बाद “डील” 90 हजार पर बंद हुई—लेकिन दारोगा को शायद अंदाजा नहीं था कि इस बार सामने कोई आम आदमी नहीं, बल्कि निगरानी की नजर है।
जैसे ही पैसे हाथ में आए, निगरानी विभाग की टीम ने फिल्मी अंदाज में एंट्री मारी और मौके पर ही धर दबोचा। इस पूरी कार्रवाई का नेतृत्व डीएसपी श्रीराम चौधरी ने किया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।
अब सवाल सिर्फ एक दारोगा का नहीं, पूरे सिस्टम का है—क्या वर्दी के पीछे छिपे ऐसे चेहरे ही आम लोगों के भरोसे को तोड़ रहे हैं? फिलहाल निगरानी विभाग आगे की कार्रवाई में जुटा है, लेकिन इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि “रिश्वत का खेल” अब भी बंद नहीं हुआ है… बस खिलाड़ी बदलते रहते हैं।
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नालंदा से वीरेंद्र कुमार की रिपोर्ट…