पटना: बिहार विधान परिषद की चार सीटों पर हुए चुनाव में तीन सीटों पर हार के बाद जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने गुरुवार, 5 नवंबर को पटना स्थित पार्टी कार्यालय में समीक्षा बैठक आयोजित की। बैठक में चुनावी नतीजों के कारणों, संगठन की कमजोरियों, उम्मीदवारों के प्रदर्शन और चुनाव के दौरान नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई। हालांकि, इस महत्वपूर्ण बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री एवं पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार, केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार शामिल नहीं हुए। इन प्रमुख चेहरों की गैरमौजूदगी के बीच प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा की अध्यक्षता में बैठक हुई, जिसमें राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।
विधान परिषद चुनाव में जदयू को चार में से केवल पटना स्नातक सीट पर जीत मिली, जबकि सारण शिक्षक, तिरहुत स्नातक और दरभंगा शिक्षक सीट पर पार्टी उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा। लगातार तीन सीटों पर मिली शिकस्त के बाद पार्टी नेतृत्व ने चुनावी प्रदर्शन की समीक्षा करने और संगठन के भीतर की कमियों को चिन्हित करने की पहल की है।
भाजपा से हमारा रिश्ता फेविकोल जैसा, गठबंधन पर उमेश कुशवाहा का बयान
समीक्षा बैठक से पहले भाजपा के साथ गठबंधन को लेकर पूछे गए सवाल पर जदयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा के साथ जदयू का रिश्ता फेविकोल की तरह मजबूत है। दोनों दलों के बीच दो दशक से अधिक पुराना संबंध है और इसे लेकर किसी तरह की गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि बात का बतंगड़ बनाने की जरूरत नहीं है।
उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब विधान परिषद चुनाव में जदयू के तीन उम्मीदवारों की हार के बाद पार्टी के कुछ प्रत्याशियों ने सहयोगी दलों, खासकर भाजपा की चुनावी भूमिका पर सवाल उठाए थे। ऐसे में उमेश कुशवाहा का बयान गठबंधन में किसी तरह की दूरी या दरार की अटकलों को खारिज करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
चार सीटों में सिर्फ एक पर मिली जीत
विधान परिषद चुनाव के परिणाम जदयू के लिए निराशाजनक रहे। पार्टी को पटना स्नातक सीट पर जीत मिली, जबकि तीन अन्य सीटों पर उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा।
पटना स्नातक सीट पर जदयू के नीरज कुमार ने राजद के दिलीप पटेल को 4,655 वोटों से हराया। वहीं, सारण शिक्षक सीट पर जदयू उम्मीदवार आनंद पुष्कर को निर्दलीय राहुल राज ने 1,815 वोटों से पराजित किया। तिरहुत स्नातक सीट पर जदयू के अभिषेक झा को निर्दलीय बंशीधर ब्रजवासी ने 9,147 वोटों से हराया। जबकि दरभंगा शिक्षक सीट पर जदयू उम्मीदवार घनश्याम राय को जन सुराज के डॉ. सुरेश प्रसाद राय ने 3,226 वोटों से शिकस्त दी।
तीन सीटों पर मिली हार के बाद पार्टी के सामने यह सवाल खड़ा है कि चुनावी तैयारी और संगठनात्मक मजबूती के बावजूद उम्मीदवारों को अपेक्षित समर्थन क्यों नहीं मिला।
पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल नेताओं पर कार्रवाई के संकेत
बैठक में चुनाव के दौरान पार्टी के खिलाफ काम करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में रही। पार्टी की ओर से संकेत दिया गया कि चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल पाए जाने वाले छोटे-बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे लोगों को जल्द पार्टी से निष्कासित करने की बात भी सामने आई है।
बैठक में चुनाव जीतने और हारने वाले उम्मीदवारों के साथ उन जिलों के जिलाध्यक्षों को भी बुलाया गया था, जहां मतदान हुआ था। उनसे चुनाव के दौरान संगठन की सक्रियता, मतदाताओं से संपर्क, स्थानीय स्तर पर प्रचार और चुनाव प्रबंधन से जुड़ी जानकारी ली जानी थी। पार्टी यह समझने की कोशिश कर रही है कि किन क्षेत्रों में संगठन कमजोर पड़ा और कहां उम्मीदवारों को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाया।
हार के बाद सहयोगी दलों पर भी उठे थे सवाल
चुनाव परिणाम सामने आने के बाद जदयू के कुछ पराजित उम्मीदवारों ने एनडीए के सहयोगी दलों की भूमिका पर सवाल उठाए थे। तिरहुत स्नातक सीट से हारे अभिषेक झा ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सहयोगी दलों के अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने की बात उठाई थी।
वहीं, सारण शिक्षक सीट से पराजित आनंद पुष्कर ने आरोप लगाया था कि एनडीए की बैठकों में भाजपा के सांसदों और विधायकों को स्कूलों में जाकर शिक्षकों से संपर्क करने की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन जमीन पर अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखी। उन्होंने यह भी कहा था कि गठबंधन के नेताओं ने मौजूदा एमएलसी को चुनाव नहीं लड़ने के लिए मनाने का भरोसा दिया था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
आनंद पुष्कर ने निर्दलीय उम्मीदवारों राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए थे। इन दोनों उम्मीदवारों ने जदयू प्रत्याशियों को हराया था। ऐसे में समीक्षा बैठक में एनडीए के भीतर चुनावी तालमेल और सहयोगी दलों की सक्रियता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहा।
अनंत सिंह प्रकरण और ललन सिंह की भूमिका भी चर्चा में
पटना स्नातक सीट के चुनाव के दौरान मोकामा विधायक अनंत सिंह और जदयू उम्मीदवार नीरज कुमार के बीच विवाद भी सामने आया था। अनंत सिंह पर नीरज कुमार का विरोध करने और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगे थे। इसके बाद जदयू ने अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था।
नीरज कुमार की जीत के बावजूद चुनाव के दौरान सामने आए इस विवाद ने पार्टी के भीतर राजनीतिक मतभेदों को उजागर किया था। समीक्षा बैठक में इस प्रकरण और संगठन पर इसके प्रभाव को लेकर भी चर्चा की संभावना रही।
इसके अलावा केंद्रीय मंत्री और मुंगेर सांसद ललन सिंह की चुनावी भूमिका भी चर्चा में रही थी। पटना स्नातक सीट पर नीरज कुमार के पक्ष में उनके प्रचार अभियान में सक्रियता को लेकर सवाल उठे थे। ऐसे में चुनाव के दौरान वरिष्ठ नेताओं की भागीदारी और प्रचार अभियान में उनकी भूमिका की समीक्षा भी पार्टी के लिए अहम मानी जा रही है।
नेताओं ने कहा- गलतियों को चिन्हित कर आगे की रणनीति बनेगी
बैठक में शामिल जदयू विधायक रणधीर सिंह ने बताया कि चुनाव में मिली हार पर बातचीत हुई है और कहां-कहां गलतियां हुईं, उन्हें चिन्हित किया गया है। वहीं, विधायक विनय कुमार चौधरी ने कहा कि समीक्षा बैठक में यह पता चलेगा कि पार्टी से कहां चूक हुई।
तिरहुत स्नातक सीट से जदयू उम्मीदवार रहे अभिषेक झा भी बैठक में शामिल होने पहुंचे। उन्होंने कहा कि चुनाव लोकतंत्र का हिस्सा है और इसमें कई तरह की बातें होती रहती हैं। उन्होंने बैठक में शामिल होने के बाद आगे अपनी बात रखने की बात कही।
अब संगठन की मजबूती और भविष्य की रणनीति पर नजर
तीन सीटों पर हार के बाद जदयू के सामने संगठन को मजबूत करने, चुनावी प्रबंधन की कमियों को दूर करने और कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने की चुनौती है। पार्टी नेतृत्व जिलाध्यक्षों और उम्मीदवारों से मिली जानकारी के आधार पर आगे की रणनीति तैयार करेगा। साथ ही पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर भी निर्णय लिया जा सकता है।
इस समीक्षा बैठक का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है कि चुनावी हार के बाद जहां पार्टी के भीतर जिम्मेदारी तय करने की चर्चा है, वहीं दूसरी ओर भाजपा के साथ गठबंधन को लेकर उमेश कुशवाहा ने फेविकोल जैसी मजबूती का संदेश दिया है। अब देखना होगा कि समीक्षा के बाद जदयू संगठन में क्या बदलाव करती है और चुनावी हार से सबक लेकर आगामी राजनीतिक चुनौतियों की तैयारी कैसे करती है।
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