पटना: बिहार की सियासत में पंचायत राज मंत्री दीपक प्रकाश का मामला अब नया मोड़ ले चुका है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच उन्हें विधान परिषद (MLC) का सदस्य बना दिया गया है। इस कदम को लेकर जहां सरकार को तत्काल राहत मिलती दिख रही है, वहीं कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं मानी जा रही।
दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई भी गैर-विधायक व्यक्ति अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री रह सकता है। आरोप है कि दीपक प्रकाश इस तय अवधि के बाद भी मंत्री पद पर बने रहे। इसी मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है, जिसमें उनकी नियुक्ति को असंवैधानिक बताया गया है।
घटनाक्रम पर नजर डालें तो 31 जुलाई को भाजपा ने अपने MLC देवेश कुमार से इस्तीफा दिलवाया। इसके बाद 5 अगस्त को राज्यपाल ने दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य मनोनीत कर दिया और 6 अगस्त को उन्होंने शपथ ले ली। माना जा रहा है कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद लिया गया, ताकि मंत्री पद पर बना रहना कानूनी रूप से संभव हो सके।
कानूनी जानकारों की मानें तो MLC बनने के बाद तत्काल बर्खास्तगी का खतरा काफी हद तक टल गया है, लेकिन मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट अब यह जांच सकता है कि छह महीने की सीमा खत्म होने के बाद मंत्री पद पर बने रहना संवैधानिक था या नहीं। यदि अदालत इसे गलत मानती है, तो उस अवधि में लिए गए फैसलों की समीक्षा हो सकती है।
कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अदालत जरूरत पड़ने पर यह निर्देश दे सकती है कि MLC बनने के बाद दीपक प्रकाश को दोबारा मंत्री पद की शपथ लेनी चाहिए, ताकि उनकी स्थिति पूरी तरह वैध हो सके। हालांकि, ‘डी फैक्टो सिद्धांत’ के तहत उनके द्वारा लिए गए प्रशासनिक फैसलों को स्वतः निरस्त नहीं किया जाएगा, क्योंकि वे उस समय पद पर कार्यरत थे।
इधर, राजनीतिक हलकों में एक और चर्चा तेज है। शपथ ग्रहण समारोह में NDA के शीर्ष नेताओं की अनुपस्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां हाल के अन्य कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता मौजूद रहे थे, वहीं इस बार उनकी दूरी को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं कि कहीं यह फैसला दबाव में तो नहीं लिया गया।
वहीं, याचिकाकर्ता का कहना है कि केवल MLC बनाए जाने से मूल विवाद खत्म नहीं होता। उनका तर्क है कि छह महीने के बाद मंत्री पद पर बने रहना असंवैधानिक था और इस अवधि के दौरान मिले सभी लाभों की भी जांच होनी चाहिए।
अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी है। अदालत का फैसला ही तय करेगा कि दीपक प्रकाश को पूरी राहत मिलेगी या फिर यह मामला आगे और राजनीतिक तथा कानूनी विवाद को जन्म देगा।
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