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Bihar: साहब… मुझे जिंदा मान लीजिए, ताकि बुढ़ापा भूखे पेट न कटे, 82 साल के बुजुर्ग को सरकारी रिकॉर्ड ने बना दिया मृत!

आरा: “साहब, मैं जिंदा हूं… आप मुझे मरा हुआ क्यों बता रहे हैं? अगर मेरी पेंशन बंद हो गई तो...
आरा: “साहब, मैं जिंदा हूं… आप मुझे मरा हुआ क्यों बता रहे हैं? अगर मेरी पेंशन बंद हो गई तो मैं और मेरी पत्नी कैसे जिएंगे?”

ये दर्द भरी गुहार है भोजपुर के आरा प्रखंड के पिरौटा गांव निवासी 82 वर्षीय ढोड़ा राम की। उम्र के इस पड़ाव पर जब उन्हें सरकारी मदद और सहारे की जरूरत है, तब सरकारी रिकॉर्ड की एक गलती ने उन्हें कागजों में मृत बना दिया है।

ढोड़ा राम पिछले तीन महीने से खुद को जिंदा साबित करने के लिए कभी बैंक तो कभी प्रखंड कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं। उनके हाथ में लाठी है, पैरों में कमजोरी है, लेकिन उम्मीद अब भी जिंदा है कि कोई अधिकारी उनकी बात सुनेगा और उन्हें फिर से “जीवित” कर देगा।

रिकॉर्ड में मौत, लेकिन सामने खड़े हैं ढोड़ा राम

भोजपुर के पिरौटा गांव के रहने वाले ढोड़ा राम का कहना है कि उन्हें उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब बैंक पहुंचने पर पता चला कि सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया है।

उन्होंने बताया कि होली से पहले उन्होंने अपनी वृद्धावस्था पेंशन की राशि निकाली थी। कुछ दिन बाद जब खाते में दोबारा पेंशन की राशि आई और वह पैसे निकालने बैंक पहुंचे तो कर्मचारियों ने भुगतान करने से इनकार कर दिया।

बैंक कर्मियों ने बताया कि सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार उनकी मृत्यु हो चुकी है, इसलिए पेंशन रोक दी गई है।

जब उन्होंने ऑनलाइन दस्तावेज निकलवाया तो उसमें लिखा था कि सत्यापन के दौरान लाभार्थी मृत पाया गया, जिसके बाद उसे मृत घोषित करते हुए पेंशन बंद कर दी गई।

यह देखकर ढोड़ा राम की आंखों में आंसू आ गए। उनका सवाल है कि जब वह खुद सामने खड़े हैं, गांव में रह रहे हैं, तो आखिर उन्हें मृत किसने घोषित कर दिया?

20 साल पहले टूटा पैर, अब पेंशन ही सहारा

ढोड़ा राम बताते हैं कि करीब 20 साल पहले मजदूरी करते समय उनका पैर टूट गया था। हादसे के बाद वह पहले की तरह काम नहीं कर पाए। पैर में रॉड लगने के बाद चलने-फिरने में भी परेशानी होने लगी।

उम्र बढ़ने के साथ मजदूरी करना पूरी तरह बंद हो गया। ऐसे में सरकार से मिलने वाली वृद्धावस्था पेंशन ही उनके और उनकी पत्नी फुसूंद्रा देवी के जीवन का एकमात्र सहारा बन गई।

लेकिन अब वही पेंशन तीन महीने से बंद है।

झोपड़ी में गुजर रहा बुढ़ापा, पेंशन बंद होने से बढ़ी परेशानी

ढोड़ा राम और उनकी पत्नी बेहद खराब आर्थिक स्थिति में जीवन गुजार रहे हैं। उनका घर झोपड़ीनुमा है, जो बारिश के दिनों में टपकने लगता है।

ढोड़ा राम बताते हैं कि रात में उन्हें चचरी के सहारे सोना पड़ता है। पत्नी किसी तरह चूल्हा जलाकर दोनों का पेट भरती हैं।

उनकी कोई संतान नहीं है। तीन बेटियां हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। आर्थिक परेशानियों के बावजूद बेटियां समय-समय पर माता-पिता की मदद करने गांव आती हैं।

तीन महीने से लगा रहे सरकारी दफ्तरों के चक्कर

ढोड़ा राम ने बताया कि जब उन्हें अपनी मौत की जानकारी मिली तो वह बैंक, प्रखंड कार्यालय और संबंधित विभागों के पास गए।

लेकिन हर जगह उनसे अपने जीवित होने का प्रमाण मांगा गया।

बुजुर्ग का कहना है कि वह अधिकारी से सिर्फ यही मांग कर रहे हैं कि उन्हें जीवित मान लिया जाए, ताकि उनकी पेंशन दोबारा शुरू हो सके और उनका बुढ़ापा भूखे पेट न कटे।

बेटी बोली- माता-पिता पूरी तरह पेंशन पर निर्भर

ढोड़ा राम की बेटी कमलावती देवी ने बताया कि उनके माता-पिता पूरी तरह वृद्धावस्था पेंशन पर निर्भर हैं।

पेंशन बंद होने के बाद परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि पिता लगातार कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।

डीएम कार्यालय में दिया गया आवेदन

गांव के युवक मुकेश तिवारी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी कार्यालय में आवेदन देकर पेंशन बहाल कराने और रिकॉर्ड में सुधार की मांग की है।

उन्होंने बताया कि ढोड़ा राम पूरी तरह जीवित हैं और गांव में सभी लोग उन्हें जानते हैं। सरकारी रिकॉर्ड में हुई गलती के कारण उन्हें परेशान होना पड़ रहा है।

अब ढोड़ा राम को उम्मीद है कि प्रशासन उनकी समस्या का समाधान करेगा और कागजों में दर्ज “मौत” को हटाकर उन्हें फिर से उनका हक मिलेगा।

Mahuaa News

Author at mahuaanews.com
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